‘आखिरी 200 मीटर में ठान लिया था, मेडल लेकर ही जाना है’

पारुल चौधरी ने साझा की एशियन गेम्स में इतिहास रचने की कहानी, बोलीं- 14 साल की मेहनत और माता-पिता के भरोसे ने दिलाई कामयाबी

मेरठ। एशियन गेम्स में लगातार दूसरी बार दोहरे पदक जीतकर इतिहास रचने वाली मेरठ की बेटी पारुल चौधरी शुक्रवार को शहर लौटीं तो उनका जोरदार स्वागत हुआ। ढोल-नगाड़ों और फूल-मालाओं के बीच पारुल ने अपनी ऐतिहासिक उपलब्धि के पीछे छिपे संघर्ष और मेहनत की कहानी साझा की। उन्होंने बताया कि 5000 मीटर दौड़ के आखिरी 200 से 250 मीटर में उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि अब यहां से मेडल लेकर ही जाना है।

पारुल ने कहा कि पिछली बार भी उन्होंने दो पदक जीते थे और इस बार भी दो पदक लेकर लौटी हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि इस बार पदकों का रंग बदल गया। उनके पास अब एशियन गेम्स के तीनों रंग के पदक हैं। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय 14 साल की लगातार मेहनत, कठिन ट्रेनिंग, माता-पिता के अटूट समर्थन और कोच गौरव त्यागी के अनुशासन को दिया।

चार साल नहीं, लंबे संघर्ष से मिलती है सफलता

पारुल ने युवा खिलाड़ियों और अभिभावकों को संदेश देते हुए कहा कि सफलता दो-चार साल में नहीं मिलती। उन्हें खुद 14 साल की मेहनत के बाद यह मुकाम हासिल हुआ है। उन्होंने कहा कि पढ़ाई हो या खेल, प्रशिक्षण लगातार जारी रखना चाहिए और खुद के साथ कोच पर भी भरोसा रखना चाहिए।

उन्होंने बताया कि वर्ष 2012 में कोच गौरव त्यागी के पास प्रशिक्षण शुरू किया था। उस समय उन्हें और उनकी बहन प्रीति को लड़कों और सेना के खिलाड़ियों के साथ कठिन अभ्यास कराया जाता था। कड़े अनुशासन के कारण उस समय मुश्किल लगता था, लेकिन आज उन्हें महसूस होता है कि उसी प्रशिक्षण ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया।

जब लोगों ने कहा- लड़कियां वापस आ जाएंगी

पारुल ने अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताया कि शुरुआत में गांव और आसपास के लोग कहते थे कि लड़कियां खेल में कुछ नहीं कर पाएंगी और कुछ समय बाद वापस आकर शादी कर लेंगी। लेकिन उनके माता-पिता ने किसी की बात नहीं सुनी और दोनों बहनों को पूरा समर्थन दिया। उन्होंने कहा कि उनके दो भाई भी हैं, लेकिन माता-पिता ने दोनों बेटियों पर पूरा भरोसा जताया।

पारुल ने अन्य अभिभावकों से भी अपील की कि वे बच्चों से तत्काल परिणाम की उम्मीद न करें। उन्हें चार से छह साल का समय, पूरा सहयोग और भरोसा दिया जाए तो परिणाम जरूर सामने आएगा। उन्होंने कहा कि आज वही लोग गांव की बेटियों को खेल में आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं, जिन्होंने कभी उन्हें रोकने की कोशिश की थी।

अगला लक्ष्य विश्व चैंपियनशिप और ओलंपिक

पारुल ने बताया कि अब उनका लक्ष्य अगले साल होने वाली विश्व चैंपियनशिप और उसके बाद ओलंपिक है। उन्होंने कहा कि वह तीन से पांच दिन परिवार के साथ समय बिताने के बाद दोबारा ट्रेनिंग शुरू करेंगी। उनका प्रयास रहेगा कि आगे भी देश, गांव, कोच, जिले और प्रदेश का नाम रोशन करें।

कोच बोले- सुबह 5:30 बजे भी सबसे पहले पहुंचती थीं

कोच गौरव त्यागी ने बताया कि पारुल और उनकी बहन प्रीति सुबह 5:30 बजे की असेंबली में उनसे भी पहले पहुंच जाती थीं। पारुल का घर स्टेडियम से करीब 15-20 किलोमीटर दूर था, इसके बावजूद दोनों बहनों ने नियमित अभ्यास में कभी पीछे हटने का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने कहा कि पारुल और प्रीति ने आराम और सुविधाओं को छोड़कर खेल को प्राथमिकता दी। माता-पिता के सहयोग ने भी उनकी सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

बहन प्रीति बोलीं- पारुल की जीत मेरी जीत जैसी

पारुल की बहन प्रीति चौधरी ने कहा कि चोट के कारण वह खुद खेल में आगे नहीं बढ़ सकीं, हालांकि बाद में सीआईएसएफ से जुड़कर खेलों में भाग ले रही हैं। उन्होंने कहा कि जब भी पारुल पदक जीतती हैं, उन्हें ऐसा लगता है जैसे उन्होंने खुद पदक जीता हो। पारुल की उपलब्धियों से गांव की कई लड़कियां अब खेलों की ओर बढ़ रही हैं और उनके अभिभावक भी उनका हौसला बढ़ा रहे हैं।

पारुल ने पुलिस अधिकारी के रूप में भी महिलाओं को संदेश देते हुए कहा कि व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में हो, उसे अपने काम में पूरी मेहनत और समर्पण के साथ 100 प्रतिशत योगदान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि ईमानदारी और समर्पण के साथ काम करने पर सफलता हासिल की जा सकती है।

No comments:

Post a Comment

Popular Posts