थाली पर पहरा और बचत पर सवाल

- हरिओम हंसराज

आज के दौर में जब हम सुबह उठकर अखबार पढ़ते हैं या खबरें देखते हैं, तो एक अजीब सा विरोधाभास नजर आता है। एक तरफ बड़े-बड़े दावे हैं कि हम दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी ताकत बनने वाले हैं, और दूसरी तरफ वही पुराने सुझाव सुनने को मिलते हैं कि खाने का तेल कम इस्तेमाल करिए या सोना मत खरीदिए। सवाल यह उठता है कि क्या देश की आर्थिक सेहत सुधारने की पूरी जिम्मेदारी सिर्फ आम आदमी की थाली और उसकी छोटी-छोटी बचतों पर ही टिकी है?

सबसे पहले बात करते हैं खाने के तेल की। भारत एक खेती-किसानी वाला देश है, फिर भी यह कितनी बड़ी विडंबना है कि हम अपनी जरूरत का करीब 60 प्रतिशत तेल विदेशों से मंगवाते हैं। रूस-यूक्रेन का युद्ध हो या अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम ऑयल के दाम बढ़ें, हमारी रसोई में आग लग जाती है। सरकार का तर्क होता है कि बाहर से तेल मंगाने में बहुत सारा डॉलर खर्च हो जाता है, जिससे देश का खजाना खाली हो रहा है। यह बात तकनीकी रूप से सही हो सकती है, लेकिन एक साधारण परिवार के लिए इसका क्या मतलब? क्या कोई मां अपने बच्चे के खाने में इसलिए कटौती कर दे क्योंकि देश का ट्रेड डेफिसिट बढ़ रहा है?

हैरानी की बात यह है कि पिछले कई दशकों में हम तिलहन के मामले में आत्मनिर्भर क्यों नहीं हो पाए? सरकारें आती-जाती रहीं, मिशन बनते रहे, लेकिन आज भी हम इंडोनेशिया और मलेशिया के भरोसे बैठे हैं। जब कीमतें काबू से बाहर होती हैं, तो जनता को कम खाने की सलाह देना एक तरह से अपनी नीतिगत हार को स्वीकार करना है। असली समाधान तो तब होता जब हमारे खेतों में इतना सरसों, सोयाबीन और सूरजमुखी उगता कि हमें बाहर की तरफ देखना ही न पड़ता। लेकिन वहां ध्यान देने के बजाय, सारा बोझ उपभोग करने वाले पर डाल दिया जाता है।

अब आते हैं गोल्ड पर। भारत में सोने का मतलब सिर्फ गहना नहीं होता, यह एक सुरक्षा कवच है। हमारे समाज में, खासकर मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों के लिए, सोना मुसीबत का सबसे बड़ा साथी है। जब बैंक लोन नहीं देते या अस्पताल का बिल अचानक सामने आ जाता है, तो यही सोना काम आता है। सरकार कहती है कि सोना खरीदने से देश का पैसा ब्लॉक हो जाता है और यह अर्थव्यवस्था के लिए डेड इन्वेस्टमेंट है। इसलिए कभी इस पर इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ा दी जाती है, तो कभी भावनात्मक अपील की जाती है कि लोग सोना न खरीदें।

लेकिन क्या सरकार ने कभी सोचा है कि लोग सोने के पीछे क्यों भागते हैं? इसका सीधा सा जवाब है भरोसा। आज भी आम आदमी को शेयर बाजार की उतार-चढ़ाव भरी चाल समझ नहीं आती। उसे लगता है कि जमीन खरीदना अब उसके बस के बाहर है। ऐसे में सोना ही एकमात्र ऐसी चीज बचती है जिसे वह थोड़े-थोड़े पैसे बचाकर खरीद सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत नकदी में बदल सकता है। जब सरकार कहती है कि सोना मत खरीदो, तो वह एक तरह से उस आदमी की आर्थिक सुरक्षा पर चोट करती है जिसके पास निवेश का कोई दूसरा आसान रास्ता नहीं है।

डेटा की भाषा में बात करें तो भारत हर साल सैकड़ों टन सोना आयात करता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है। लेकिन यह दबाव कम करने के लिए जनता को टोकने के बजाय, क्या ऐसी नीतियां नहीं होनी चाहिए थीं जिससे लोगों की कमाई बढ़ती और निवेश के सुरक्षित विकल्प मिलते? आज महंगाई की दर अक्सर बैंक के फिक्स्ड डिपॉजिट के ब्याज से ज्यादा होती है। यानी बैंक में रखा पैसा बढ़ नहीं रहा, बल्कि समय के साथ उसकी कीमत कम हो रही है। ऐसे में आदमी सोना नहीं खरीदेगा तो क्या करेगा?

एक और बड़ा मुद्दा है मध्यम वर्ग की घटती परचेजिंग पावर। आज पेट्रोल-डीजल से लेकर रसोई गैस तक, सब कुछ महंगा है। ऊपर से जीएसटी और टैक्स का बोझ अलग। जब आदमी पहले से ही हर तरफ से दबा हुआ है, तब उसे यह कहना कि आप अपनी जरूरतें कम कर लो, उसके घावों पर नमक छिड़कने जैसा है। देश का विकास तब माना जाता है जब लोगों की थाली में सामान बढ़े, न कि तब जब उन्हें अपनी पसंद और जरूरत में कटौती करनी पड़े।

हैरानी तो इस बात पर है कि ये नसीहतें सिर्फ आम आदमी के लिए ही क्यों हैं? क्या बड़े कॉरपोरेट घरानों और फिजूलखर्ची वाले सरकारी प्रोजेक्ट्स पर भी ऐसी लगाम लगती है? जब विज्ञापनों और आयोजनों पर करोड़ों फूंके जाते हैं, तब बचत की याद क्यों नहीं आती? सारा ज्ञान सिर्फ उसी को क्यों दिया जाता है जो मुश्किल से महीने का बजट चला रहा है?

समाधान नसीहतों में नहीं, नियत में है। सरकार को उत्पादन बढ़ाकर आत्मनिर्भरता लानी होगी, न कि जनता से अभाव में जीने की अपील करनी चाहिए। दबाव और नसीहत से अर्थव्यवस्थाएं नहीं चलतीं, वे सही नीतियों और जनता के विश्वास से चलती हैं। उम्मीद है कि भविष्य में हमें कम खाने की नहीं,खुलकर जीने की आर्थिक परिस्थितियां मिलेंगी। तभी हम सही मायनों में एक विकसित राष्ट्र कहलाएंगे।

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