..तो आप तैयार हैं कटने के लिए!

 
- ललिता जोशी
भगवान दुश्मन को भी कोर्ट -कचहरी और अस्पताल का मुंह न दिखाये । जब से चिकित्सा के क्षेत्र में नए-नए प्रयोग हुए हैं तो इलाज आसान हुआ है । मरीज को एक सामान्य जीवन के मौका मिल जाता है । चिकित्सा के क्षेत्र में इतनी प्रगति हो गई है कि अबतो अंग प्रत्यारोपण आम बात हो गई है । कई बार लगता है कि ये अस्पताल अब अस्पताल न हो कर गाड़ी के  गैराज जैसे हो गए हैं। जैसे गाड़ी का  जो पार्ट खराब हो जाए उसे निकाल कर बदल लो  अगर उसके बैगर काम चल सकता है ऐसे ही शरीर का जो अंग खराब हो जाए उसे काटो और उसके स्थान पर अंग प्रत्यारोपण करना हो तो करवा लो ।

इन अस्पतालों में इलाज के लिए लाइनें लगी रहती हैं । बीमारियों से घिरे मरीज भी समान्य जीवन जीना चाहते हैं । मरीज को डॉक्टर भगवान समान लगता है क्योंकि ये मरीज को जीवन दान देता है । बहुत बार डॉक्टर मरीज को मौत के मुंह से निकाल लाता है। ये मरीज का दूसरा जन्म होता है । अपनी बीमारी के सिलसिले में हमें भी अस्पताल का भ्रमण करना पड़ा । सरकारी अस्पतालों की हालत का  हम सभी को मालूम है । इसीलिये अब लोग हैल्थ इन्श्युरेंस की तरफ दौड़ लगा रहे हैं ।

हमने भी इन्श्युरेंस ले लिया और सोचा कि अगर स्वास्थ्य का कोई इश्यू आएगा तो बड़े -बड़े नामीगिरामी अस्पतालों में अनुभवी डॉक्टरों से इलाज करवा सकते हैं । जब हमें अपने घुटनों में असहनीय पीड़ा होनी शुरू हुई तो पहले हमने घर के देसी इलाज अपनाए। जब तक हम इसे सह सकते थे तब तक ऐसे ही चलते रहे। जब घुटने का दर्द सहा नहीं गया और रहा नहीं गया तो अस्पतालों के चक्कर शुरू हो गए । जब डॉक्टर साहब यानि हड्डी विशेषज्ञ को दिखाया तो उन्होनें सबसे पहले ब्लड टेस्ट और कुछ एक्सरे लिखे । अब तो जांच के बिना कुछ भी नहीं होता, चाहे इलाज हो या कोई विभागीय कार्रवाई।

कार्यालयों में अनिमियतताओं और घपलों की जांच के लिए विभागीय समिति का गठन  किया  जाता है । इसी तरह  मरीज भी डॉक्टरों के लिए केस होते हैं इलाज के लिए । जब ये सब रिपोर्ट लेकर जब हड्डी विशेषज्ञ के पास पहुंचे तो रिपोर्ट देखकर डॉक्टर साहब यानि पृथ्वी के भगवान ने अपना फैसला सुनाया की देखिये आप बड़े सही समय पर आ गए हैं । आप के घुटने ओपरेशन के लिए एक दम तैयार हैं । आप एस्टिमेट ले लीजिये और फिर मैं आपको सर्जरी की डेट दे दूंगा ।

मैं पृथ्वी के इस भगवान को थोड़ी देर तक अपलक निहारती रही । तभी डॉक्टर साहब ने जब नैक्सट बोला तो मैंने हड़बडा कर पूछा की कोई एक्ससेरसाइस और कुछ दवाइयाँ हो तो दे दीजिये । उन्होनें मुंह बनाकर बोला अभी आपकी उम्र हो गई है कितना चल पाओगे आप । अभी आप अपनी सर्जरी करवा लीजिये । मुझे  उनकी बातों से लगा में वो पका हुआ फल हूँ जिसके कटने का सही समय आ गया है । जितने उत्साह से निजी अस्पताल में विहार कर रहे थे तो लगा कि पके आम की तरह जमीन में गिर पड़े हैं । जो कटने के लिए तैयार पड़ा है ।
मानों मरीज कोई आदमी न होकर तरकारी है जिसे काटने के लिए हमारे भगवान तैयार रहते हैं । ये अस्पताल वो कॉर्पोरेट अस्पताल बन गए हैं जिन्हें अपना भी नफा देखना है। आप नामी -गिरामी अस्पतालों में जाएं तो  आपको लगेगा कि  आप  किसी फाइव  स्टार होटल में प्रवेश  कर  गए  हो  । डॉक्टर ओथ लेने वाले डॉक्टर क्या अपने लक्ष्य से भटक रहे हैं । अस्पतालों के कारनामों से समाचार पत्र भरे पड़े रहते हैं । आम आदमी तो आम की तरह कटता ही रहेगा ।
आम आदमी तो पैदा ही कटने के लिए होता है। ये कभी मंहगाई, कभी टैक्स तो कभी इलाज के नाम पर कटते ही हैं। आम आदमी की नियति में लिखा है कटना।
(मुनिरका एन्क्लेव, दिल्ली)

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