कृषि मॉडल में बदलाव
राजीव त्यागी
हरित क्रांति के प्रोत्साहन के कृषि उत्पादन बढ़ा। ग्रामीण आर्थिकी फली-फूली। लेकिन वक्त के साथ इस मॉडल की सीमाएं सामने आयीं। नब्बे के दशक में नयी नीति के बाद कृषि संकट और गहरा गया। आज कृषि क्षेत्र को एक वैकल्पिक विकास मॉडल की जरूरत है जो किसान व पर्यावरण हितैषी हो। समय के साथ हरित क्रांति के विकास मॉडल की सीमाएं उजागर होने लगीं। कृषि उत्पादन में वृद्धि की संभावनाएं सिमटने लगीं तथा कई तरह के नकारात्मक परिणाम भी सामने आए।
असल में तो हरित क्रांति का उद्देश्य ही पर्याप्त भूमि सुधारों के बिना कृषि क्षेत्र व फसलों का बाजारीकरण करना था। ये अलग बात है कि इससे फायदा हुआ। वर्ष 1990 के दशक में नव-उदारवादी और कॉर्पोरेट समर्थक नीतियां अपनाने के बाद कृषि संकट और गहरा गया। आज कृषि क्षेत्र को एक ऐसे वैकल्पिक विकास मॉडल की जरूरत है जो किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण की रक्षा भी कर सके।
दरअसल रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरता और गुणवत्ता पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। भूजल का तेजी से गिरता स्तर, सिंचाई की दोषपूर्ण पद्धतियां और गेहूं-धान का एकांगी फसल चक्र कृषि की स्थिरता के सामने गंभीर चुनौती बन गए हैं। इसके अतिरिक्त, गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए भूमि अधिग्रहण के कारण खेती का क्षेत्रफल भी घट रहा है। उपजाऊ कृषि भूमि का इस तरह लगातार कम होना खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका के लिए चिंताजनक है।
जलवायु परिवर्तन की बढ़ती चुनौती कृषि संकट को और गंभीर बना रही है। बेमौसम बारिश, अत्यधिक गर्मी और अन्य चरम मौसमी घटनाओं से फसलों को बार-बार नुकसान हो रहा है। बहरहाल, ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी, कुपोषण, भूमिहीनता, कर्ज और बेरोजगारी की समस्याएं बढ़ी हैं। यह स्थिति छोटे और सीमांत किसानों के लिए अधिक संकटपूर्ण है।





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