मदरसों की सेवाओं को सामने लाने की जरूरत: प्रो. ख्वाजा इकरामुद्दीन

सीसीएसयू के उर्दू विभाग में ऑनलाइन कार्यक्रम, वक्ताओं ने उर्दू भाषा और साहित्य के विकास में मदरसों के योगदान को सराहा

मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (सीसीएसयू) के उर्दू विभाग और अंतरराष्ट्रीय उर्दू विद्वान संघ (आयुसा) के संयुक्त तत्वावधान में बृहस्पतिवार को ‘अदबनुमा’ के अंतर्गत ‘उर्दू के विकास में मदरसों की भूमिका’ विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित किया गया। मुख्य अतिथि प्रसिद्ध आलोचक प्रो. ख्वाजा इकरामुद्दीन ने कहा कि मदरसों में साहित्य कम या अधिक होने पर निराश होने के बजाय उनकी सेवाओं को सामने लाने की आवश्यकता है। उन्होंने बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के मदरसों की डिग्रियों को जेएनयू में मान्यता दिए जाने का भी उल्लेख किया।

मदरसों में भाषा और साहित्य पर जोर जरूरी

कार्यक्रम के संरक्षक और उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. असलम जमशेदपुरी ने कहा कि मदरसों के विद्यार्थी उर्दू पढ़ते हैं, लेकिन कई बार उर्दू साहित्य से पूरी तरह परिचित नहीं हो पाते। भाषा के ज्ञान के साथ साहित्य, संस्कृति और धार्मिक शिक्षा पर भी ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि मदरसों की डिग्रियों की मान्यता को लेकर विश्वविद्यालयों में अलग-अलग स्थिति है, लेकिन यहां से शिक्षा प्राप्त विद्यार्थी विभिन्न क्षेत्रों में सफलता हासिल कर रहे हैं।

विशिष्ट अतिथि दारुल उलूम अरबी कॉलेज, मेरठ के प्राचार्य डॉ. मुफ्ती मुहम्मद रिजवान कासमी ने कहा कि मदरसे सीमित संसाधनों के बावजूद उर्दू की सेवा कर रहे हैं। विद्यार्थियों को धार्मिक शिक्षा भी उर्दू के माध्यम से दी जाती है और मदरसों से अनेक पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं। उन्होंने कहा कि मदरसों के शिक्षक हवा और पानी की तरह उर्दू की सेवा कर रहे हैं। उन्होंने स्वतंत्रता के बाद उर्दू के प्रचार-प्रसार में आई चुनौतियों का भी उल्लेख किया।

मदरसों की सेवाओं को भुलाया नहीं जा सकता

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सगीर अफराहीम ने कहा कि मदरसों के विद्यार्थी कंप्यूटर के माध्यम से भी उल्लेखनीय कार्य कर सकते हैं। फारसी के साथ अरबी और उर्दू का ज्ञान उनके लिए उपयोगी साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भी मदरसे बड़ी सेवाएं दे रहे हैं और उनसे शिक्षा प्राप्त कर कई लोगों ने उर्दू साहित्य के क्षेत्र में योगदान दिया है।

कार्यक्रम का परिचय देते हुए डॉ. इरशाद स्यानवी ने कहा कि मकतब, मदरसे और जामिया भारत सहित अन्य देशों में उर्दू की सेवा कर रहे हैं। मदरसों में शब्दों के शुद्ध उच्चारण, बोलने के लहजे और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी योगदान दिया जाता है। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन और साहित्य में योगदान देने वाली विभिन्न हस्तियों का उल्लेख किया।

इस दौरान जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली के शोधार्थी मुफ्ती राहत अली सिद्दीकी और सीसीएसयू की एमए छात्रा नायाब ने शोधपत्र प्रस्तुत किए। कार्यक्रम की शुरुआत सईद अहमद सहारनपुरी के कुरआन पाठ और मुहम्मद ईसा राना की नात से हुई। संचालन मुहम्मद आबिद अली कासमी ने किया, जबकि नमरा ने धन्यवाद ज्ञापित किया। ऑनलाइन कार्यक्रम में डॉ. आसिफ अली, डॉ. शादाब अलीम, फरहत अख्तर, मुहम्मद शमशाद सहित अनेक विद्यार्थी और गणमान्य लोग शामिल हुए।

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