• उल्देपुर में जमीन का कारोबार बेनकाब करने की तैयारी, आयोग की रिपोर्ट पर टिकी निगाहें

  • खेतों से मार्केट तक का सफर, उल्देपुर में 2400 बैनामों की जांच से मचेगी हलचल

  • अवैध कॉलोनियों की नींव में दबे जमीन के सौदों की पड़ताल, 2400 बैनामे जांच के घेरे में

  • मेरठ। उल्देपुर में अवैध कॉलोनियों और जमीन की खरीद-फरोख्त की जांच के बाद बिल्डरों, प्रॉपर्टी एजेंटों और मेरठ विकास प्राधिकरण (मेडा) के अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित न्यायिक आयोग निरीक्षण और दस्तावेजों की जांच के बाद वापस लौट गया है। अब आयोग अपनी रिपोर्ट सीधे सुप्रीम कोर्ट में पेश करेगा। रिपोर्ट में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय हो सकती है।

    न्यायिक आयोग की जांच में उल्देपुर में जमीन के कारोबार को लेकर कई अहम जानकारियां सामने आई हैं। सरकारी अभिलेखों में उपजाऊ और लाल डोरा दर्ज जमीन पर बिना भू-उपयोग परिवर्तन और अनुमति के कॉलोनियां विकसित किए जाने की बात सामने आई है। पिछले दस वर्षों में गांव में 2400 से अधिक बैनामे होने की जानकारी मिली है। जमीन की बिक्री सर्किल रेट से करीब दस गुना अधिक कीमत पर किए जाने की बात भी सामने आई है। करीब तीन हजार की आबादी वाले गांव में बैनामों की इतनी बड़ी संख्या ने जमीन के कारोबार और जिम्मेदार विभागों की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    कई बार बेची गई जमीन, विकसित हो गईं कॉलोनियां

    सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक आयोग ने गुरुवार को उल्देपुर पहुंचकर तीन अवैध कॉलोनियों का निरीक्षण किया था। आयोग अध्यक्ष एवं पूर्व न्यायाधीश सुधांशु धूलिया और पूर्व न्यायाधीश ब्रह्म सिंह वर्मा ने कॉलोनियों का क्षेत्रफल, विकास कार्य, आबादी और जमीन से जुड़े दस्तावेजों की जानकारी ली। रंगीन बाउंड्रीवाल, मुख्य गेट और दुकानों के साथ विकसित मार्केट देखकर आयोग ने भी आश्चर्य जताया। आयोग ने जमीन की कई बार खरीद-फरोख्त होने की आशंका जताते हुए इससे जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल की।

    प्रॉपर्टी एजेंटों ने दिखाए निवेश के सपने

    आरोप है कि प्रॉपर्टी एजेंटों ने लोगों को बेहतर आवास और निवेश का सपना दिखाकर अवैध कॉलोनियां विकसित कीं। चर्चा है कि पल्लवपुरम की पॉश कॉलोनियों में रहने वाले कुछ लोगों ने भी यहां प्लॉट खरीदकर निवेश किया या कॉलोनियां विकसित कराईं। अवमानना याचिकाकर्ता लोकेश खुराना का कहना है कि उनके पास जमीन की खरीद-फरोख्त से जुड़े प्रमाण हैं। वह इन तथ्यों को न्यायिक आयोग के सामने रखने का प्रयास करेंगे।

    12 से अधिक कॉलोनियों पर कार्रवाई, फिर कैसे बस गए मकान?

    मेडा के दस्तावेजों में उल्देपुर की 12 से अधिक अवैध कॉलोनियों में ध्वस्तीकरण की कार्रवाई दर्ज है। इसके बावजूद यहां मकान और दुकानें कैसे बन गईं, यह बड़ा सवाल है। कॉलोनियों में बिजली के खंभे और लाइनें लग चुकी हैं। लोग मकान बनाकर रह रहे हैं और कई स्थानों पर बाजार भी विकसित हो गए हैं। आरोप है कि प्राधिकरण के अधिकारी कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति करते रहे। जोन-बी में आने वाले उल्देपुर क्षेत्र में पिछले दो वर्षों से निकिता सिंह जोन प्रभारी के रूप में तैनात हैं।

    पांच साल के अधिकारियों का मांगा गया ब्योरा

    न्यायिक आयोग के गठन के बाद मेडा ने रजिस्ट्री विभाग से पिछले दस वर्षों के बैनामों का रिकॉर्ड जुटाया है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले पांच वर्षों में प्राधिकरण में तैनात रहे उपाध्यक्ष, सचिव, जोन प्रभारी और अन्य कर्मचारियों का ब्योरा भी मांगा है। जांच में यह पता लगाया जाएगा कि अवैध कॉलोनियों के विकास के दौरान अधिकारियों की क्या भूमिका रही और समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई। इससे प्राधिकरण में भी हलचल है और संबंधित दस्तावेज जुटाए जा रहे हैं।

    आयोग की रिपोर्ट दीपावली के बाद आने की संभावना

    न्यायिक आयोग ने दोपहर करीब ढाई बजे लावड़-सोफीपुर मार्ग से उल्देपुर पहुंचकर निरीक्षण शुरू किया था। टीम ने मौके पर नक्शों और राजस्व अभिलेखों का मिलान कर जमीन की वास्तविक स्थिति समझी। आयोग यह भी जांच रहा है कि कॉलोनियों की जमीन सरकारी है या निजी, वास्तविक मालिक कौन हैं और खरीद-फरोख्त किस प्रक्रिया से हुई। निरीक्षण के बाद दोनों पूर्व न्यायाधीश दिल्ली लौट गए। मेडा अधिकारियों के अनुसार आयोग अब सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा। रिपोर्ट दीपावली के बाद आने की संभावना जताई जा रही है। इसके बाद ही उल्देपुर की अवैध कॉलोनियों, जिम्मेदार लोगों और वहां रह रहे लोगों के भविष्य को लेकर स्थिति स्पष्ट होगी। अलग हटकर हेडिंग में

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