वोटिंग का अधिकार खतरे में, सुप्रीम कोर्ट जल्द करे फैसला: जस्टिस नरीमन ने चुनाव आयोग पर उठाए सवाल
SIR में वोटरों के नाम काटे जाने पर जताई चिंता, बोले- चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति सरकार के हाथों में होना ‘खतरे की घंटी’
नई दिल्ली। वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने चुनाव आयोग के कामकाज पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि यदि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाते हैं और चुनाव आयोग इस तरह काम करता है तो यह लोकतंत्र में लोगों के वोट देने के अधिकार के लिए गंभीर खतरा है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम की वैधता पर जल्द फैसला लेने की अपील की।
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर उठाया सवाल
जस्टिस नरीमन ने कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को पूरी तरह मौजूदा सरकार के हाथों में छोड़ना गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने इसे ‘रेड फ्लैग’ बताते हुए कहा कि इससे चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।
उन्होंने पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान करीब 90 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने से जुड़ी रिपोर्टों का भी हवाला दिया। उनका कहना था कि इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट की ओर से SIR पर रोक लगाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाया गया।
दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का भी जिक्र
पूर्व जस्टिस ने उन रिपोर्टों पर भी चिंता जताई, जिनमें दावा किया गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने दो अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को नजरअंदाज करते हुए महत्वपूर्ण फैसले लिए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था का प्रभावी और निष्पक्ष तरीके से काम करना लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी है।
जस्टिस भुइयां ने भी जताई थी चिंता
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां भी SIR और वोटर लिस्ट से नाम हटाने के मुद्दे पर चिंता जता चुके हैं। उन्होंने कहा था कि मृत मतदाता के मामले को छोड़कर एक बार वोटर लिस्ट में नाम शामिल हो जाने के बाद बिना नोटिस और सुनवाई के उसे हटाया नहीं जाना चाहिए।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि वोटर लिस्ट में शामिल होने और वोट देने के अधिकार को नागरिक की पहचान से अलग करके नहीं देखा जा सकता। SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के बीच दोनों पूर्व और वर्तमान न्यायिक टिप्पणियों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता अधिकारों को लेकर बहस को और तेज कर दिया है।

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