बच्चों की हो सुरक्षा

इलमा अज़ीम 

कोई बच्चा किसी अपराध में लिप्त पाया जाता है तो गंभीर विमर्श होता है कि दंड सजा देने वाला हो या सुधारकारी। कोई भी बच्चा जन्म से अपराधी नहीं होता। उसकी पारिवारिक माली हालत, परिवार व पड़ोस का माहौल और परिस्थितिजन्य हालात उसे अपराध की अंधी गलियों में धकेल देते हैं। सही मायने में कोई भी बच्चा जब आपराधिक न्याय प्रणाली के दायरे में आता है तो वह वह हमारे समाज की उन तमाम नाकामियों का नतीजा होता है, जिसकी शुरुआत पहले ही हो चुकी होती है।

 देश की शीर्ष अदालत ने भी पिछले दिनों टिप्पणी की थी कि गरीबी, असमानता, अशिक्षा और सामाजिक भेदभाव बच्चों में अपराध की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी हमें याद दिलाती है कि अपराध के साथ-साथ उन हालात को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए, जिनमें वह अपराध हुआ है। 

दरअसल, परिवार की आर्थिक बदहाली बच्चे को नियमित स्कूल जाने से रोकती है। इसके अलावा परिवार में कलह, परिवार के मुखिया का नशीले पदार्थों का आदी होना, बच्चे की कुसंगति, साथियों का दबाव और सामाजिक भेदभाव जैसी चीजों का सामूहिक प्रभाव ऐसी स्थितियां पैदा कर सकता है, जो कुछ बच्चों को अपराध की अंधी गलियों में धकेल सकता है। देश की शीर्ष अदालत ने यह भी चिता जताई कि किशोर न्याय अधिनियम के सुरक्षात्मक प्रावधान सभी जरूरतमंद बच्चों तक नहीं पहुंच पाए हैं।

 इस कानून को लागू करने में गंभीर कमियों को दूर किया जाना चाहिए। सही मायने में किशोर न्याय अधिनियम के अंतर्गत कानून बदले की भावना पर नहीं, बल्कि बच्चों की देखभाल, सुरक्षा, पुनर्वास और अच्छा नागरिक बनाकर समाज में फिर से शामिल करने की सोच पर आधारित रहा है। इसके अलावा बच्चे न्यायिक व्यवस्था के ऐसे कुचक्र में फंस सकते हैं, जहां इसके क्रियान्वयन से जुड़े लोग शायद उनकी कम उम्र को गंभीरता से न लें या फिर बच्चों को दी जाने वाली सुरक्षा की संवेदनशीलता को पूरी तरह से न समझ पाएं। 

सही मायने में इस जटिल समस्या का समाधान किशोर न्याय व्यवस्था को अपराध को न होने देने की सोच पर केंद्रित बनाने से संभव हो सकता है। दरअसल, स्कूल छोड़ने वाले बच्चे, बाल मजदूरी से मुक्त कराये गए बच्चे, नशीले पदार्थों के सेवन से बचाये गए बच्चे जब कल्याणकारी संस्थाओं के संपर्क में बार-बार आते हैं तो उन स्थितियों में प्रशिक्षित सोशल वर्कर, काउंसलर और बाल संरक्षण अधिकारियों को सकारात्मक व सुधारकारी भूमिका निभानी चाहिए।

 हकीकत में किशोर न्याय बोर्ड को पर्याप्त पेशेवर मदद की जरूरत है। ऐसे बच्चों की संस्थागत देखभाल खत्म होने के बाद भी बच्चों के पुनर्वास के कार्य को निरंतर जारी रखने की जरूरत होनी चाहिए। बदलते हालात में यह चुनौती एक नया रूप लेती दिख रही है। जिसकी ओर पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने भी ध्यान दिलाते हुए कहा कि आज के बच्चे बहुत कम उम्र में तकनीक और सोशल मीडिया के जरिये जटिल जानकारी, ग्राफिक कंटेंट और वयस्कों वाले अनुभवों के संपर्क में आ रहे हैं। यहां ज्वलंत प्रश्न यह भी पैदा होता है कि क्या समाज इस सुधार परीक्षा की कसौटी पर खरा उतर सकता है? 

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