श्राद्ध: कृतज्ञता की वह पुकार जो सूक्ष्म लोकों तक जाती है
गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर
पितृ पक्ष आरंभ हो चुका है। ऐसे समय में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि हम श्राद्ध क्यों करते हैं और दिवंगत आत्मा के लिए इसका क्या महत्व है? श्राद्ध केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि श्रद्धा के साथ किया गया कृत्य है। इसमें दिवंगत व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता, स्मरण और सम्मान का भाव प्रमुख है।
जब हम किसी दिवंगत व्यक्ति के योगदान को स्वीकार करते हैं और श्रद्धा से उनका स्मरण करते हैं, तो हमारे भीतर सकारात्मक भाव उत्पन्न होते हैं। यही भाव श्राद्ध को सार्थक बनाते हैं। केवल रस्म निभाने से अधिक महत्वपूर्ण उसके पीछे की श्रद्धा और भावना है।
सेवा और तर्पण का भाव
पितृ पक्ष में जरूरतमंदों को भोजन कराने और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने की परंपरा भी इसी भाव से जुड़ी है। किसी भूखे व्यक्ति की भूख मिटने पर उसके भीतर से आशीर्वाद और कृतज्ञता का भाव निकलता है। सेवा से मिलने वाली तृप्ति, आनंद और पूर्णता की अनुभूति श्राद्ध के भाव को और गहरा करती है।
मृत्यु के बाद की मध्यावस्था
गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद आत्मा की विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन मिलता है। मान्यता के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा कुछ समय तक प्रेत अवस्था में रहती है। शरीर छूट जाने के बाद भी वह तुरंत नई अवस्था में सहज नहीं हो पाती। धीरे-धीरे वह इस परिवर्तन को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ती है।
इस यात्रा में ज्ञान को महत्वपूर्ण माना गया है। मंत्रों के माध्यम से आत्मा को यह बोध कराया जाता है कि वह शरीर, मन और बुद्धि नहीं है। शरीर प्रकृति के पंचतत्वों में विलीन होता है और आत्मा को अपनी वास्तविक सत्ता का बोध कर आगे बढ़ने का संदेश दिया जाता है।
‘गौ’ का व्यापक अर्थ
वैतरणी नदी पार करने के लिए गाय की पूंछ पकड़ने की मान्यता का भी प्रतीकात्मक अर्थ बताया गया है। संस्कृत में ‘गौ’ का अर्थ गाय के अलावा ज्ञान, गति और मुक्ति भी माना गया है। अर्थात ज्ञान का सहारा लेकर जीवन और मृत्यु के महासागर को पार करने का संदेश इसमें निहित है।
तर्पण का अर्थ है तृप्ति
मान्यता के अनुसार प्रेत अवस्था के बाद आत्मा पितृ लोक की ओर बढ़ती है। तर्पण के माध्यम से दिवंगत प्रियजनों को मानो यह आश्वासन दिया जाता है कि उनके अधूरे कार्य और परिवार की जिम्मेदारियां पीछे रह गए लोग संभालेंगे। अब वे अपनी इच्छाओं और सांसारिक मोह को छोड़कर आगे बढ़ें।
‘तर्पण’ का भाव ही तृप्ति, पूर्णता और आगे बढ़ने से जुड़ा है। तिल अर्पित करते हुए ‘तृप्यताम्’ कहा जाता है, जिसका भाव है—तृप्त हो जाओ, पूर्ण हो जाओ और आगे बढ़ो।
शोक नहीं, स्मरण और कृतज्ञता का अवसर
श्राद्ध केवल शोक मनाने का अवसर नहीं है। यह अपने पूर्वजों और दिवंगत प्रियजनों को स्मरण करने, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और जीवन की निरंतरता को स्वीकार करने का अवसर है। किसी प्रियजन के चले जाने के बाद जीवनभर शोक में डूबे रहना प्रेम का एकमात्र स्वरूप नहीं है। प्रेम का भाव उन्हें शांति से आगे बढ़ने देने और स्वयं भी जीवन में आगे बढ़ने में है।
जो आया है, वह जाएगा। जो गया है, वह आगे बढ़ेगा। और जो यहां है, उसे भी आगे बढ़ना है।

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