मंजर काज़मी की कहानियों को पाठ्यक्रम में शामिल करने की जरूरत : प्रो. सगीर अफ़राहीम
सीसीएसयू के उर्दू विभाग में ‘मंजर काज़मी की कहानियाँ’ विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम, साहित्यकारों ने कहानी लेखन और शैली पर रखे विचार
मेरठ, 24 सितंबर। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग और आयुसा के संयुक्त तत्वावधान में गुरुवार को ‘मंजर काज़मी की कहानियाँ’ विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में साहित्यकारों और आलोचकों ने डॉ. मंजर काज़मी के कहानी साहित्य, प्रतीकात्मक शैली और साहित्यिक योगदान पर चर्चा की। अध्यक्षता अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं प्रसिद्ध साहित्यकार प्रो. सगीर अफ़राहीम ने की।
प्रो. सगीर अफ़राहीम ने कहा कि मंजर काज़मी अपने दौर के महत्वपूर्ण कहानीकार थे। प्रगतिवाद के दौर में विकसित उनकी कहानियों में धार्मिक शैली के साथ प्रतीकात्मकता भी प्रमुख रूप से दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि काज़मी की कहानियों में आम जनता पर होने वाले अत्याचारों को प्रतीकों और संकेतों के माध्यम से उजागर किया गया है। उनकी कहानियों को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने की आवश्यकता है।
कार्यक्रम के परिचय में उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. असलम जमशेदपुरी ने कहा कि कार्यक्रम का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि डॉ. मंजर काज़मी की जयंती के अवसर पर इसका आयोजन किया गया। उन्होंने कहा कि काज़मी असाधारण कहानीकार थे। उनकी कहानी ‘सियाह ग़िलाफ़ काले जनरल’ पाठकों को अपनी ओर बांध लेती है। आधुनिकतावाद के दौर में उन्होंने महत्वपूर्ण कहानियां लिखकर उर्दू साहित्य में विशिष्ट स्थान बनाया।
डॉ. परवेज़ शहरीयार ने कहा कि मंजर काज़मी आधुनिकतावाद के प्रमुख समर्थकों में थे और उन्होंने प्रतीकात्मक कहानियों के क्षेत्र में अलग पहचान बनाई। उनके अनुसार काज़मी की शैली में ख़लील जिब्रान का प्रभाव दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि जिस तरह वे बड़े शिक्षक थे, उसी तरह बड़े कहानीकार और साहित्यकार भी थे।
डॉ. अख्तर आज़ाद ने कहा कि मंजर काज़मी उस पीढ़ी के आधुनिक कहानीकार थे, जब आधुनिकतावाद अपने अंतिम चरण में था। उन्होंने करीब 42 वर्षों की साहित्यिक यात्रा में 55 कहानियां लिखीं। उनकी कहानियों में इस्लामी विषयों की प्रमुखता रही। उन्होंने कहा कि इस्लामी विषयों पर प्रभावी कहानी लिखना चुनौतीपूर्ण कार्य है, जिसे मंजर काज़मी ने विशिष्ट शैली के साथ किया।
मुख्य अतिथि प्रो. ज़ैन रामिश ने कहा कि मंजर काज़मी कहानीकार और आलोचक होने के साथ कई अन्य साहित्यिक खूबियों से भी संपन्न थे। उन्होंने बेहतरीन कहानियों और आलोचनात्मक लेखों के माध्यम से पाठकों को प्रभावित किया। उन्होंने काज़मी की पुस्तक ‘अतराफ़-ए-ग़ज़ल’ का विशेष उल्लेख करते हुए उर्दू ग़ज़ल की शैली और परंपरा पर भी विचार रखे।
कार्यक्रम का शुभारंभ मोहम्मद ईसा राणा ने कुरआन की तिलावत से किया। स्वागत एवं परिचयात्मक वक्तव्य शोधार्थी सैयदा मरियम इलाही ने दिया। संचालन डॉ. इरशाद स्यानवी और धन्यवाद ज्ञापन मोहम्मद नदीम ने किया। लखनऊ से आयुसा की अध्यक्ष प्रो. रेशमा परवीन समेत डॉ. अलका वशिष्ठ, मोहम्मद शमशाद, सईद अहमद सहारनपुरी, फरहत अख्तर, महविश, नायाब सहित अनेक छात्र-छात्राएं ऑनलाइन और ऑफलाइन कार्यक्रम से जुड़े।

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