विकसित भारत के लिए ज्ञान, चरित्र और कौशल से युक्त नागरिक जरूरी

ज्ञानसभा मेरठ-2026 में शिक्षा की भूमिका पर मंथन, भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक मूल्यों और युवा जिम्मेदारी पर हुआ संवाद

मेरठ। सीसीएसयू और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय ‘ज्ञानसभा मेरठ-2026’ के उद्घाटन सत्र में विकसित भारत के निर्माण में शिक्षा की भूमिका, भारतीय ज्ञान परंपरा, चरित्र निर्माण, कौशल विकास और नैतिक मूल्यों पर मंथन हुआ। मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह रामदत्त चक्रधर, बीज वक्ता डॉ. अतुल कोठारी और कुलपति प्रो. संगीता शुक्ला ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का प्रमुख माध्यम बताया।

विकास का आधार केवल आर्थिक समृद्धि नहीं : चक्रधर

रामदत्त चक्रधर ने कहा कि विकसित भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक या सैन्य शक्ति बढ़ाना नहीं, बल्कि ज्ञान, चरित्र और मानवीय मूल्यों से युक्त नागरिक तैयार करना होना चाहिए। देश के नागरिकों में अतीत के गौरव का बोध, वर्तमान की चुनौतियों की समझ और भविष्य के सपने होने चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत का विकास मॉडल भारतीय जीवन-दृष्टि और मूल्यों पर आधारित होना चाहिए।

उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि वैज्ञानिक, इंजीनियर और चिकित्सक तैयार करने के साथ यह भी देखना होगा कि क्या चरित्रवान और जिम्मेदार नागरिक तैयार हो रहे हैं। शिक्षक अपने आचरण से विद्यार्थियों को संस्कार देते हैं, इसलिए उनमें ईमानदारी, अनुशासन और संवेदनशीलता का होना जरूरी है।



भौतिक विकास के साथ नैतिक प्रगति जरूरी : कोठारी

डॉ. अतुल कोठारी ने कहा कि अंतरिक्ष, जैव प्रौद्योगिकी और अन्य क्षेत्रों में भारत की उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं, लेकिन केवल भौतिक प्रगति को विकास नहीं माना जा सकता। आर्थिक विकास के साथ पर्यावरण, नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों पर भी ध्यान देना होगा।

उन्होंने कहा कि विकसित भारत के निर्माण में सरकार के साथ प्रत्येक नागरिक की भूमिका है। विश्वविद्यालयों को भी यह विचार करना चाहिए कि वे देश के विकास में क्या योगदान दे सकते हैं। ज्ञान, चरित्र और कौशल का समन्वय ही शिक्षा को सार्थक बनाएगा।



मानव निर्माण से होगा विकसित भारत का निर्माण : कुलपति

कुलपति प्रो. संगीता शुक्ला ने कहा कि 2047 के विकसित भारत का वास्तविक निर्माण मानव निर्माण से होगा। शिक्षा में कौशल के साथ संस्कार, अधिकारों के साथ कर्तव्यबोध और ज्ञान के साथ जिम्मेदारी की भावना विकसित करनी होगी।

उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय में वैदिक गणित, भारतीय दर्शन, स्वास्थ्य विज्ञान, पारंपरिक ज्ञान, शोध एवं नवाचार को शिक्षा से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। क्रिएटर, इनोवेशन लैब, इन्क्यूबेशन सेंटर, उद्योग सहभागिता और कौशल विकास जैसी पहल विद्यार्थियों को समस्या समाधान और नवाचार की दिशा में आगे बढ़ा रही हैं।

प्रो. शुक्ला ने मातृभाषा को संस्कृति, पहचान और चिंतन प्रक्रिया का वाहक बताते हुए भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पाठ्य सामग्री और डिजिटल लर्निंग की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि ज्ञान के साथ विनम्रता, सफलता के साथ संवेदनशीलता और प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग विकसित भारत की पहचान होनी चाहिए।



युवाओं से संवाद, चार समूहों में हुआ मंथन

ज्ञानसभा में युवाओं के साथ संवाद सत्र भी हुआ। रामदत्त चक्रधर ने शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के कार्यकर्ताओं के साथ ‘ज्ञान से जीवन तक’ विषय पर संवाद किया। इसके बाद अटल सभागार में विद्यार्थियों के साथ ‘युवा संवाद, युवा नवाचार, उद्यमिता एवं विकसित भारत-2047 की ओर’ विषय पर चर्चा हुई और विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान किया गया।

भोजन के बाद कार्यक्रम को चार समूहों में बांटा गया। विद्यार्थियों के समूह में देशराज शर्मा ने व्यक्तित्व निर्माण पर, शिक्षकों के समूह में उमेश सिंह ने 21वीं सदी के शिक्षक की भूमिका पर, प्रोफेसरों के समूह में उमाशंकर पचौरी ने परिवार, विद्यालय और समाज की साझी जिम्मेदारी पर तथा अन्य समूह में प्रो. सचिन माहेश्वरी ने व्यवस्था, तकनीक एवं राष्ट्र विषय पर विचार रखे। शाम को भी विभिन्न समूहों में विशेषज्ञों के व्याख्यान और संवाद हुए।

कार्यक्रम का संचालन प्रो. कृष्णकांत शर्मा ने किया। अतिथियों का परिचय प्रो. अनिल मलिक और स्वागत उद्बोधन प्रो. शिवराज पुंडीर ने दिया। इस अवसर पर प्रो. मुकेश कुमार शर्मा, प्रेस प्रवक्ता मितेंद्र कुमार गुप्ता, इंजीनियर प्रवीण पवार सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी और छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।

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