यूएन के वीटो पर फिर घमासान, एर्दोगन ने खत्म करने की मांग उठाई

फ्रांस-मेक्सिको की पहल को ब्रिटेन का समर्थन, सामूहिक अत्याचारों के मामलों में वीटो के स्वैच्छिक इस्तेमाल पर रोक का प्रस्ताव

नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो व्यवस्था को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के वीटो अधिकार को समाप्त करने की मांग उठाई है। वहीं फ्रांस और मैक्सिको की उस पहल को ब्रिटेन ने समर्थन दिया है, जिसमें नरसंहार, युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ गंभीर अपराध जैसे सामूहिक अत्याचारों के मामलों में स्थायी सदस्यों से वीटो का स्वैच्छिक और सामूहिक इस्तेमाल न करने का आह्वान किया गया है।

एर्दोगन ने 22 सितंबर को प्रकाशित अपने लेख में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार की मांग करते हुए कहा कि वैश्विक निर्णय लेने की व्यवस्था आज की दुनिया की वास्तविकताओं के अनुरूप होनी चाहिए। उन्होंने स्थायी सदस्यता और वीटो विशेषाधिकार को खत्म करने की वकालत की। रूस ने इस मांग के विपरीत सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने की संभावना का समर्थन किया है, लेकिन मौजूदा वीटो अधिकार बनाए रखने की बात कही है।

क्या है फ्रांस-मेक्सिको की पहल?

फ्रांस और मैक्सिको वर्ष 2015 से एक ऐसी राजनीतिक पहल चला रहे हैं, जिसके तहत सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य सामूहिक अत्याचारों के मामलों में स्वेच्छा से वीटो का इस्तेमाल रोकने पर सहमत हों। इसमें नरसंहार, मानवता के खिलाफ अपराध और युद्ध अपराध जैसे मामले शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र के रिकॉर्ड के मुताबिक 2026 में इस पहल को 118 सदस्य देशों का समर्थन प्राप्त था। यह पहल वीटो अधिकार को कानूनी रूप से खत्म नहीं करती और न ही संयुक्त राष्ट्र चार्टर में बदलाव करती है।

फ्रांस ने सितंबर में सुरक्षा परिषद में कहा कि पहल का उद्देश्य बड़े पैमाने पर अत्याचारों के दौरान परिषद को निष्क्रिय होने से बचाना है। फ्रांसीसी प्रतिनिधि के अनुसार इसे लेकर सदस्य देशों के बीच समर्थन बढ़ा है।

पांच देशों के पास ही क्यों है वीटो?

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 15 सदस्य होते हैं। इनमें अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन पांच स्थायी सदस्य हैं, जबकि 10 सदस्य अस्थायी होते हैं। स्थायी सदस्यों को किसी प्रस्ताव पर वीटो करने का अधिकार प्राप्त है। इसका मतलब है कि किसी प्रस्ताव के खिलाफ स्थायी सदस्य का नकारात्मक मत आने पर वह प्रस्ताव पारित नहीं हो सकता।

यह व्यवस्था द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय बनी थी। उस समय युद्ध के बाद उभरी प्रमुख शक्तियों को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा व्यवस्था में विशेष भूमिका दी गई। वर्तमान में इसी व्यवस्था की प्रतिनिधित्व और निर्णय प्रक्रिया को लेकर सुधार की मांग उठती रही है।

ब्रिटेन का रुख क्या है?

ब्रिटेन फ्रांस के साथ सामूहिक अत्याचारों के मामलों में वीटो के जिम्मेदार इस्तेमाल की पहल से जुड़ा है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि ब्रिटेन ने अपने वीटो अधिकार को सामान्य रूप से समाप्त करने की घोषणा कर दी है। ब्रिटिश सरकार की हालिया संयुक्त राष्ट्र गतिविधियों में सुरक्षा परिषद और उसके वीटो अधिकार का इस्तेमाल जारी है।

इस तरह फिलहाल दो अलग-अलग मांगें सामने हैं—एर्दोगन सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के वीटो अधिकार को समाप्त करने की मांग कर रहे हैं, जबकि फ्रांस-मैक्सिको पहल का केंद्र गंभीर सामूहिक अत्याचारों की स्थिति में वीटो के स्वैच्छिक इस्तेमाल पर रोक लगाना है। दोनों प्रस्तावों के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मौजूदा व्यवस्था में अलग-अलग स्तर के बदलाव की जरूरत होगी।

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