शांति के लिए दुनिया को नई सोच की जरूरत
- योगेश कुमार गोयल
पूरी दुनिया आज ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां युद्ध, आतंकवाद, आर्थिक असमानता, जलवायु संकट, साइबर हमले और सामाजिक असहिष्णुता ने मानवता की साझा आकांक्षाओं को बारंबार चुनौती दी है। ऐसे में शांति का विचार केवल युद्ध न करने तक सीमित नहीं रह गया है। शांति आज जीवन, न्याय, समानता, पर्यावरण संरक्षण और मानसिक संतुलन से जुड़ी एक व्यापक संस्कृति है। 21 सितंबर को मनाया जाने वाला ‘अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस’ इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक विषय ‘शांति में निवेश करें : हर किसी के लिए, हर जगह, हर दिन’ के तहत मानवता के लिए एक ऐतिहासिक अवसर है।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1981 में अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस की स्थापना का उद्देश्य युद्ध और हिंसा के दुष्परिणामों पर ध्यान दिलाना था। आज के वैश्विक परिदृश्य में इसका महत्व पहले से कहीं अधिक है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, विश्व में लगभग 2.4 अरब लोग किसी न किसी रूप में संघर्षों से प्रभावित हैं। जलवायु परिवर्तन की वजह से प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि शांति केवल कूटनीतिक वार्ताओं का विषय नहीं है बल्कि वैश्विक नीति, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और आर्थिक न्याय से जुड़ा एक जटिल मुद्दा है।
शांति की संस्कृति का निर्माण यूनेस्को के उस मूल सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें कहा गया है कि ‘युद्ध मनुष्यों के दिमाग में शुरू होते हैं, इसलिए शांति की रक्षा मनुष्यों के दिमाग में ही की जानी चाहिए।’ यह दृष्टिकोण आधुनिक समय में मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सहिष्णुता से जुड़ा है। यदि बच्चों को बचपन से ही विविधता का सम्मान करना, संवाद करना, अहिंसक समाधान अपनाना और मानवाधिकारों का मूल्य समझाना सिखाया जाए तो आने वाली पीढ़ियां संघर्षों के बजाय सहयोग की संस्कृति अपनाएंगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, मानसिक तनाव और अकेलापन हिंसा और अपराध की ओर ले जाने वाले महत्वपूर्ण कारक हैं। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, योग-ध्यान, परामर्श और सामुदायिक समर्थन शांति निर्माण का आधार बन सकते हैं। शांति का संबंध शिक्षा से भी गहराई से जुड़ा है। विश्वभर में लगभग 24 करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर हैं, जिनमें अधिकांश संघर्षग्रस्त या गरीब क्षेत्रों से हैं। शिक्षा से वंचित बच्चों में हिंसा, कट्टरता और असमानता की प्रवृत्तियां बढ़ जाती हैं। इसलिए शिक्षा को शांति निर्माण के केंद्र में लाना होगा। शिक्षा कार्यक्रमों में मानवाधिकारों, लोकतंत्र, लैंगिक समानता, जलवायु जागरूकता और डिजिटल साक्षरता को शामिल करना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा पिछले वर्षों में दिए गए शांति दिवस के विषयों का विश्लेषण बताता है कि शांति के लिए समय-समय पर बदलती चुनौतियों के अनुरूप नीति निर्माण की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, 2010 में ‘शांति और विकास के लिए युवा’ पर बल दिया गया जबकि 2019 में ‘शांति के लिए जलवायु कार्रवाई’ जैसे विषयों ने पर्यावरणीय संकट को शांति का केंद्रीय मुद्दा बनाया। कोविड-19 महामारी के दौरान 2020 का विषय ‘एक साथ शांति को आकार देना’ यह दर्शाता है कि वैश्विक संकटों के समय सहयोग की संस्कृति ही समाधान का आधार बनती है। इसी प्रकार 2024 का विषय ‘शांति की संस्कृति का विकास करना’ यह इंगित करता है कि शांति को केवल युद्धविराम की अवधि तक सीमित नहीं रखा जा सकता, इसे समाज के प्रत्येक स्तर पर विकसित करना होगा।
आर्थिक असमानता शांति की राह में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में वैश्विक बेरोजगारी दर 5.6 प्रतिशत तक पहुंची जबकि करोड़ों लोग आज भी अनौपचारिक क्षेत्र में काम कर रहे हैं, जहां सामाजिक सुरक्षा का अभाव है। बेरोजगारी और आर्थिक असमानता हिंसा, अपराध और सामाजिक असंतोष को जन्म देती है। इसलिए शांति निर्माण के लिए आर्थिक नीति में समावेशी विकास को केंद्र में रखना आवश्यक है। वैश्विक विकास लक्ष्यों के तहत 2030 तक ‘कोई गरीबी नहीं’ और ‘उचित काम और आर्थिक वृद्धि’ जैसे लक्ष्यों को प्राथमिकता देना शांति निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। शांति के लिए न्याय और पारदर्शिता भी अपरिहार्य हैं। जब नागरिकों को न्याय नहीं मिलता या प्रशासन भ्रष्ट होता है तो विश्वास समाप्त हो जाता है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व के 180 में से अधिकांश देशों में भ्रष्टाचार एक बड़ी चुनौती है। शांति निर्माण के लिए स्वतंत्र न्याय प्रणाली, पारदर्शी प्रशासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कदम आवश्यक हैं। नागरिकों को सूचना का अधिकार, शिकायत निवारण तंत्र और डिजिटल प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराए जाने चाहिएं ताकि वे शासन में सक्रिय भूमिका निभा सकें। शांति केवल प्रशासनिक व्यवस्था से नहीं बल्कि नागरिकों की भागीदारी और विश्वास से भी बनती है।
शांति निर्माण में संस्कृति, कला और संवाद भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम, संगीत समारोह, नाटक, साहित्य और खेल प्रतियोगिताएं लोगों के बीच विश्वास और सहयोग का पुल बना सकते हैं। युद्धग्रस्त क्षेत्रों में सांस्कृतिक कार्यक्रम मानसिक आघात से उबरने में मदद कर सकते हैं। महात्मा गांधी का यह कथन कि ‘शांति का कोई मार्ग नहीं है, शांति ही मार्ग है’ हमें याद दिलाता है कि शांति कोई लक्ष्य नहीं, जीवन का तरीका है। इसी तरह अल्बर्ट आइंस्टीन का यह विचार कि ‘शांति बल से नहीं बल्कि समझ से कायम रहती है’ बताता है कि संवाद और समझ ही स्थायी समाधान का आधार हैं। पर्यावरण संरक्षण भी शांति निर्माण का आवश्यक अंग है। जलवायु परिवर्तन की वजह से उत्पन्न प्राकृतिक आपदाएं, जल संकट और खाद्य असुरक्षा संघर्षों को बढ़ा सकती हैं। इसलिए नवीकरणीय ऊर्जा, जल संरक्षण, जैव विविधता का संरक्षण और सतत कृषि को बढ़ावा देना आवश्यक है।
महिलाओं की सहभागिता शांति निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाती है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, संघर्ष क्षेत्रों में महिलाएं सबसे अधिक प्रभावित होती हैं, फिर भी शांति वार्ताओं में उनकी भागीदारी बेहद सीमित है। शोध बताते हैं कि जहां महिलाओं को शांति प्रक्रियाओं में शामिल किया जाता है, वहां संघर्ष समाप्त होने की संभावना 35 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। इसलिए महिलाओं के नेतृत्व को बढ़ावा देना, उन्हें शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाएं और राजनीतिक मंच उपलब्ध कराना आवश्यक है। आज की दुनिया में शांति की संस्कृति का निर्माण केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है, व्यक्ति, समुदाय, नागरिक समाज, मीडिया, शैक्षणिक संस्थाएं और अंतर्राष्ट्रीय संगठन सभी को अपनी भूमिका निभानी होगी। व्यक्तिगत स्तर पर जिम्मेदार व्यवहार, सहिष्णुता, मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल और संवाद की संस्कृति विकसित करनी होगी। सामुदायिक स्तर पर स्थानीय शांति समितियों का गठन, युवा नेतृत्व कार्यक्रम, सांस्कृतिक मेलों का आयोजन और सहयोगी नेटवर्क बनाना आवश्यक है। वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य, जलवायु समझौते और शांति निर्माण कार्यक्रमों का समर्थन करना होगा। तभी एक ऐसा विश्व संभव होगा, जहां युद्ध और हिंसा के स्थान पर संवाद, सहयोग और मानवता का सम्मान प्रमुख होगा। शांति का मार्ग कठिन अवश्य है परंतु यदि हम शिक्षा, संवाद, न्याय, पर्यावरण संरक्षण और मानसिक स्वास्थ्य को अपने जीवन का हिस्सा बनाकर कार्य करें तो स्थायी शांति का निर्माण संभव है।






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