मानसिक दबाव में यूथ
राजीव त्यागी 
आईआईटी मुंबई के एक छोत्र की आत्महत्या इन दिनों सुर्खियों में है। इसके अलावा अभी मात्र दो दिन पहले ही गाजियाबाद में सातवीं की एक छात्रा की 14वीं मंजिल से गिरकर जान चली गई। इनके अलावा राजस्थान के कोटा में जबतब छात्रों की आत्महत्या से जुड़ी खबरें आती रहती हैं। 

विचलित करने वाली यह खबर भी है कि पिछले पांच सालों में देश के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान आईआईटी में 70 होनहारों ने आत्महत्या की। गंभीर चिंता यह भी कि जुलाई से शुरू हुए सत्र में अब तक आईआईटी के तीन और आईआईएम का एक छात्र आत्महत्या कर चुका है। वहीं आईआईएससी बंगलूरु में भी पंद्रह दिन में दो छात्रों ने आत्मघात किया है। विडंबना यह है कि इन आंकड़ों में देश के अन्य शिक्षण संस्थानों के आत्मघात के मामले शामिल नहीं किए जाते हैं। 

जिससे देश में आत्महत्या करने वाले छात्रों की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आ पाती। यह अकल्पनीय है कि जिन इंजीनियरिंग संस्थानों में दाखिला लेना छात्रों का सपना होता है, वहां पहुंचकर कोई छात्र आत्महत्या क्यों कर लेता है? विचारणीय प्रश्न है कि आखिर ये छात्र आत्मघाती कदम क्यों उठा रहे हैं? क्या वे इंजीनियरिंग आदि के पाठ्यक्रम के साथ साम्य नहीं बैठा पाते? क्या सिस्टम की खामियां उन्हें हताश करती हैं? क्या ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं के छात्र अंग्रेजी के पाठ्यक्रम के साथ तालमेल नहीं बैठा पाते हैं? अक्सर चर्चा होती है कि उच्च इंजीनियरिंग संस्थानों में देश के चर्चित व महंगे अंग्रेजी स्कूलों से आए छात्रों द्वारा भाषा,जाति, ग्रामीण पृष्ठभूमि तथा आर्थिक स्तर पर अन्य छात्रों के साथ भेदभाव किया जाता है।

 आरोप है कि अंग्रेजी माध्यम से आये छात्र हिंदी व क्षेत्रीय भाषाओं से पढ़ाई करके आए छात्रों को हेय दृष्टि से देखते हैं। इंजीनियरिंग व प्रबंधन से जुड़े देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की आत्महत्या की बढ़ती घातक प्रवृत्ति के मद्देनजर सरकार ने मामले की पड़ताल के लिए पिछली जनवरी में तीन सदस्यीय समिति गठित की थी। इस समिति ने भी स्वीकार किया था कि व्यवस्था में कुछ खामियां जरूर हैं, जिसके चलते छात्र आत्मघात के लिये बाध्य होते हैं। दरअसल, कुछ छात्र शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक, आर्थिक व पारिवारिक आकांक्षाओं के बोझ के साथ अध्ययन कर रहे होते हैं। जिससे उनके मन में यह भय पैदा हो जाता है कि क्या वे अपने जीवन के लक्ष्य हासिल भी कर पाएंगे? बड़ी संख्या में मध्यमवर्गीय, गरीब परिवारों व वंचित समाज की प्रतिभाएं खून-पसीना एक करके इन संस्थानों में दाखिला लेती हैं। 

उन पर मानसिक दबाव होता है कि परिवार ने पेट काटकर और कर्ज आदि लेकर उन्हें महंगे इंजीनियरिंग व प्रबंधन संस्थानों में दाखिला दिलाया है। यदि वे असफल हुए तो परिवार को क्या मुंह दिखाएंगे? दूसरा, हमारे समाज में इंजीनियर, प्रबंधक व डॉक्टर बनने की भेड़चाल चल रही होती है। ईश्वर हर बच्चे की रचना उसके विशिष्ट गुण के साथ करता है। जरूरी नहीं है कि इंजीनियरिंग में दाखिला लेने वाले हर छात्र की रुचि इंजीनियरिंग में ही हो। कोई छात्र मानविकीय संकाय की प्रतिभा हो सकता है। इंजीनियरिंग, उसकी रुचि व मन का विषय नहीं हो सकता, जिसके चलते वो पूरे मनोयोग से इस पाठ्यक्रम से साम्य नहीं बैठा पाता। आज सोशल मीडिया की विकृतियां तमाम छात्रों की एकाग्रता को बाधित कर रही हैं।

 सोशल मीडिया उनमें हताशा व आवेश भर रहा है। नये वातावरण से साम्य न बैठा पाने व अन्य कारणों से छात्र मानसिक तनाव में आ जाते हैं। विडंबना यह है कि अधिकांश संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ नहीं हैं। बताया जाता है कि केवल दस फीसदी संस्थानों में ऐसी व्यवस्था है। अन्य संस्थानों में जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञों को बुलाया जाता है। दरअसल,भारत में मानसिक समस्याओं पर डॉक्टर से सलाह लेने में बचा जाता है। छात्रों की चिंता होती है कि कहीं शिक्षक, छात्र व परिवार के लोग उन्हें मनोरोगी न घोषित कर दें। निश्चित ही देश की इन प्रतिभाओं को असमय काल-कवलित होने से बचाने की जरूरत है।

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