"सड़क नहीं, वादा धंसा है"
- रविकान्त राऊत
13 जुलाई को केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मिलकर जिस 4,200 करोड़ रुपये के कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे का उद्घाटन किया था, वह उद्घाटन के 25वें दिन तक आते-आते 53 अलग-अलग जगहों पर धंस चुका था। 63 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे पर लोकार्पण के 25 दिन बाद भी सड़क सात जगह पर 108 मीटर तक धंस गई, और एनएचएआई के नए प्रोजेक्ट डायरेक्टर को खुद ग्रीनफील्ड क्षेत्र के 45 किलोमीटर हिस्से का निरीक्षण करने उतरना पड़ा। महीने भर के भीतर अगस्त के पहले पाँच दिनों में ही इस सड़क पर धंसाव, मिट्टी का कटाव, गड्ढे और मरम्मत की असफल कोशिशों की कई घटनाएं दर्ज हुईं, जिससे इसके निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे।
आज सामने आई प्रारंभिक तकनीकी जाँच में एक दिलचस्प लेकिन चिंताजनक तस्वीर उभरी है। आईआईटी खड़गपुर के विशेषज्ञों ने पाया कि जिन जगहों पर सड़क धंसी, वहाँ मिट्टी में गहराई तक नमी के संकेत मिले हैं, और तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि अर्थवर्क व ड्रेनेज लेयर मानकों के अनुरूप न होने पर लगातार बारिश के बाद पानी नीचे तक पहुँचकर सड़क की सतह को प्रभावित कर सकता है। हालाँकि डामर की गुणवत्ता शुरुआती जाँच में संतोषजनक पाई गई है। यानी दोष अकेले सामग्री का नहीं, बल्कि डिज़ाइन और जल-निकासी की बुनियादी इंजीनियरिंग सोच का लगता है , यह वह चीज़ है, जो किसी एक ठेकेदार की लापरवाही से ज़्यादा, पूरी निर्माण-प्रक्रिया की जल्दबाज़ी की ओर इशारा करती है।
असली सवाल यहीं खड़ा होता है। भारत बीते एक दशक में हर साल हज़ारों किलोमीटर नए हाईवे जोड़ने का दावा करता आया है, और यह उपलब्धि वास्तविक भी है। लेकिन क्या रफ्तार के इस उत्सव में गुणवत्ता की जाँच उतनी ही गंभीरता से हो रही है, जितनी उद्घाटन की तैयारी होती है? कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेस वे कोई अपवाद नहीं है। बिहार में 2020 से अब तक दर्जनों पुल गिर चुके हैं, जिनमें सबसे महँगा हादसा अगुवानी-सुल्तानगंज पुल का रहा, 1,710 करोड़ रुपये की लागत वाला यह पुल तीन बार ढह चुका है। मध्य प्रदेश में जबलपुर-भोपाल राष्ट्रीय राजमार्ग पर 400 करोड़ की लागत से बना रेलवे ओवरब्रिज चार साल भी पूरे नहीं कर पाया और गिर गया, जबकि उसका ठेकेदार पहले से ही ब्लैकलिस्टेड था। और खरगोन में भारतमाला परियोजना के तहत बना एक ब्रिज तो उद्घाटन से पहले ही धंस गया, जिसमें महज़ चार इंच कंक्रीट और 10 एमएम सरिये के इस्तेमाल की बात सामने आई
यह तस्वीर उतनी सरल नहीं जितनी लगती है। यह मानना ग़लत होगा कि हर मामला भ्रष्टाचार या जानबूझकर की गई धोखाधड़ी का नतीजा है। एक्सप्रेसवे जैसे बड़े प्रोजेक्ट में भूगर्भीय स्थितियाँ, असामान्य मानसून, और नदी-तल के ऊपर से गुज़रती सड़क का जटिल डिज़ाइन - ये सब वास्तविक इंजीनियरिंग चुनौतियां हैं। सरकार का पक्ष यह भी है कि जवाबदेही तय करने की व्यवस्था मौजूद है । ठेकेदार कंपनी को "नॉन-परफॉर्मर" घोषित कर टोल वसूली रोक दी गई है, स्वतंत्र निगरानी करने वाली इंजीनियरिंग फर्म को भी नोटिस दिया गया है, और जाँच के लिए स्वतंत्र तकनीकी संस्थान बुलाए गए हैं। संसद में भी सरकार ने स्वीकार किया कि घटिया काम के लिए ठेकेदारों से जुर्माना वसूला जाता है और ठेका रद्द होने पर सिक्योरिटी ज़ब्त की जा सकती है। यानी तंत्र पूरी तरह निष्क्रिय नहीं है, पर वह हमेशा हादसे के बाद ही सक्रिय होता है, पहले नहीं।
यहीं भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल की असली कमजोरी छुपी है जहां जवाबदेही प्रतिक्रियात्मक है, निवारक नहीं। थर्ड-पार्टी क्वालिटी ऑडिट, मिट्टी और ड्रेनेज की गहन जाँच, और स्वतंत्र निगरानी , ये सब उद्घाटन से पहले, निर्माण के दौरान होने चाहिए, न कि सड़क धंसने और सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद। जब किसी परियोजना का उद्घाटन उसकी असली परीक्षा से पहले हो जाता है, तो वह उद्घाटन नहीं, केवल एक फोटो-अवसर बनकर रह जाता है।
इस सबका सबसे बड़ा नुकसान उस आम यात्री को होता है जो हर दिन इन सड़कों पर भरोसा करके निकलता है, बिना यह जाने कि उसके पहियों के नीचे की ज़मीन कितनी मजबूत है। एक एक्सप्रेसवे केवल कंक्रीट और डामर की पट्टी नहीं होता, वह एक वादा होता है कि सरकार ने उसकी सुरक्षा को गंभीरता से लिया है। जिस दिन यह वादा धंसता है, उस दिन असली नुकसान सड़क का नहीं, उस भरोसे का होता है जिस पर विकास की पूरी कहानी टिकी है।
(जबलपुर, मध्य प्रदेश)





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