डिग्री के साथ हुनर भी ज़रूरी है


- संध्या अग्रवाल
यदि एक दिन के लिए डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर और अधिकारी काम पर न जाएँ तो निश्चित ही असुविधा होगी। लेकिन ज़रा कल्पना कीजिए, यदि उसी दिन बिजली मिस्त्री, प्लंबर, सफाईकर्मी, बस चालक, किसान, मशीन ऑपरेटर और तकनीशियन भी काम पर न आएँ, तो क्या हमारा सामान्य जीवन सुचारु रूप से चल पाएगा? शायद नहीं। यह कल्पना ही हमें उस सच्चाई से परिचित करा देती है, जिसे हम वर्षों से अनदेखा करते रहे हैं। हमने कुछ पेशों को प्रतिष्ठा का प्रतीक बना दिया और कुछ को केवल आवश्यकता का। यही सोच आज हमारे युवाओं के भविष्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है।

12 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जा रहा है। यह दिन केवल युवाओं की ऊर्जा का उत्सव मनाने का अवसर नहीं, बल्कि यह सोचने का भी है कि क्या हम उन्हें जीवन के लिए सही दिशा दे रहे हैं। क्या हमने सफलता का अर्थ केवल बड़ी डिग्री और प्रतिष्ठित नौकरी तक सीमित कर दिया है? यदि हाँ, तो समय आ गया है कि इस सोच पर पुनर्विचार किया जाए।

आज एक ओर लाखों युवा डिग्रियाँ लेकर रोजगार की प्रतीक्षा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुशल प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, मैकेनिक, बढ़ई, मशीन तकनीशियन और अनेक प्रशिक्षित कारीगरों की कमी महसूस की जा रही है। घर का छोटा-सा काम हो या किसी उद्योग की मशीन, हर जगह कुशल हाथों की आवश्यकता है। यह विरोधाभास केवल रोजगार का नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक मानसिकता का भी परिणाम है।

बचपन से बच्चों को अक्सर कहा जाता है— "अच्छी तरह पढ़ो, नहीं तो छोटे-मोटे काम करने पड़ेंगे।" यह बात उन्हें पढ़ाई के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से कही जाती है, लेकिन अनजाने में श्रम के प्रति हीन भावना भी पैदा कर देती है। धीरे-धीरे बच्चों के मन में यह धारणा बैठ जाती है कि सम्मान केवल कुछ चुनिंदा पेशों में है। जबकि सच्चाई यह है कि कोई भी ईमानदार काम छोटा नहीं होता। जिस समाज में श्रम का सम्मान कम होने लगता है, वहाँ बेरोज़गारी केवल आर्थिक नहीं, मानसिक समस्या भी बन जाती है।

हर व्यक्ति प्रशासनिक अधिकारी, डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन सकता और न ही किसी राष्ट्र को केवल इन्हीं पेशों के सहारे आगे बढ़ाया जा सकता है। एक विकसित समाज को उतनी ही आवश्यकता कुशल कारीगरों, तकनीशियनों, किसानों, नर्सों, चालकों, सेवा क्षेत्र से जुड़े कर्मियों और उद्यमियों की होती है। सभ्यता का पहिया तभी संतुलित चलता है, जब हर काम और हर कौशल को समान सम्मान मिले।

यह लेख डिग्री के महत्व को कम करके नहीं देखता। उच्च शिक्षा आज भी आवश्यक है, लेकिन शिक्षा तभी सार्थक है जब उसके साथ कौशल भी जुड़ा हो। ज्ञान व्यक्ति को सोचने की क्षमता देता है और हुनर उसे आत्मनिर्भर बनने की शक्ति देता है। केवल प्रमाणपत्र जीवन की हर चुनौती का समाधान नहीं बन सकते।

दुनिया के अनेक देशों में पढ़ाई के साथ छोटे-छोटे काम करना युवाओं के व्यक्तित्व विकास का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता है। इससे उनमें आत्मनिर्भरता, अनुशासन, समय प्रबंधन और श्रम के प्रति सम्मान का भाव विकसित होता है। हमारे यहाँ भी यदि शिक्षा के साथ कौशल और कार्य-अनुभव को समान महत्व दिया जाए, तो युवा केवल नौकरी की प्रतीक्षा करने के बजाय अपने लिए नए अवसरों का निर्माण करने का आत्मविश्वास विकसित कर सकेंगे।

आज रोजगार का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। उद्योग, सेवा क्षेत्र, डिजिटल अर्थव्यवस्था और स्थानीय उद्यम ऐसे युवाओं की तलाश में हैं, जिनके पास ज्ञान के साथ व्यावहारिक कौशल भी हो। तकनीकी सेवाओं, मशीन संचालन, मरम्मत, कृषि आधारित उद्यम, डिज़ाइन, खाद्य प्रसंस्करण और अनेक नए क्षेत्रों में सम्मानजनक अवसर मौजूद हैं। आवश्यकता केवल इस बात की है कि युवा अपनी रुचि और क्षमता के अनुरूप कौशल विकसित करें और किसी भी काम को छोटा समझने की मानसिकता से बाहर निकलें।

भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देशों में है। ऐसे में यह अपेक्षा करना कि प्रत्येक युवा को केवल सरकारी या संगठित क्षेत्र में नौकरी मिल जाएगी, यथार्थवादी नहीं है। इसलिए अब रोजगार की अवधारणा को भी व्यापक बनाना होगा। युवा केवल अवसरों की प्रतीक्षा करने वाले नहीं, बल्कि अवसरों का सृजन करने वाले बनें। स्वरोजगार, उद्यमिता और कौशल आधारित आजीविका केवल व्यक्तिगत सफलता का मार्ग नहीं, बल्कि देश की आर्थिक शक्ति को भी मजबूत बनाती है।

इस परिवर्तन की शुरुआत परिवार और शिक्षा व्यवस्था से होगी। बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक उन्हें श्रम का सम्मान सिखाना भी है। यदि कोई युवा पढ़ाई के साथ कोई तकनीकी कौशल सीखता है, छोटा उद्यम शुरू करता है या किसी सेवा क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना चाहता है, तो उसे कमतर नहीं आँका जाना चाहिए। हर बड़ी उपलब्धि की शुरुआत छोटे कदमों से ही होती है।

अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस हमें यही संदेश देता है कि युवाओं को केवल डिग्रीधारी नहीं, बल्कि सक्षम, कुशल और आत्मनिर्भर नागरिक बनाया जाए। आज आवश्यकता ऐसे युवाओं की है, जिनके पास ज्ञान भी हो, कौशल भी; सपने भी हों और उन्हें पूरा करने का साहस भी। शायद अब समय आ गया है कि हम अपने बच्चों से केवल यह न कहें कि "अच्छी पढ़ाई करो", बल्कि यह भी कहें— "पढ़ो भी, हुनर भी सीखो; क्योंकि भविष्य केवल डिग्री से नहीं, योग्यता, कौशल और कर्म से बनता है।"
(स्वतंत्र लेखिका एवं स्तंभकार)

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