राष्ट्रमंडल खेलः जगी नई उम्मीद
राजीव त्यागी
इस वर्ष के राष्ट्रमंडल खेलों में देश के खिलाड़ियों ने जैसा प्रदर्शन किया, वह एक बेहतर भविष्य का संकेत है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले हर अगले आयोजन में खेलों में जीत हासिल करने के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है, क्षमताओं की कसौटियां ज्यादा बेहतर प्रदर्शन की मांग कर रही हैं लेकिन अब भारतीय खिलाड़ियों ने भी मैदान में अपनी धमक छोड़नी शुरू कर दी है।
गौरतलब है कि ग्लासगो में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य पदक सहित कुल 39 पदक जीते। ज्यादातर खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने अच्छी खासी चुनौती पेश की लेकिन भारोत्तोलन, जूडो और पैरा खेलों में भारत ने इतिहास रचते हुए अपनी कामयाबी का झंडा बुलंद किया। खासतौर पर मुक्केबाजी में भारतीय खिलाड़ियों ने सात स्वर्ण और तीन रजत के साथ कुल दस पदक जीते बल्कि इस वर्ष के राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने मुक्केबाजी के मैदान में अपनी सबसे कामयाब छाप छोड़ी और महिला खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया।
इसके अलावा, एक ही राष्ट्रमंडल खेल में एथलेटिक्स में एक से ज्यादा पदक जीतने वाले पहले भारतीय गुलवीर सिंह भी इस आयोजन में देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि रहे। अलग-अलग खेलों में भारत के खिलाड़ियों ने शीर्ष स्तर पर रहने वाले देशों को ठोस चुनौती दी और एक तरह से यह दर्शाया कि किसी अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में उनकी उपस्थिति को अब महज औपचारिकता नहीं माना जा सकता। पदकों की संख्या के संदर्भ में देखा जाएगा तो इसे 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों की उपलब्धि से कम माना जाएगा।
हालांकि, यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि इस वर्ष के आयोजन में कुश्ती, हाकी, टेबल टेनिस और बैडमिंटन जैसे कुछ खेल नहीं थे जिसमें पारंपरिक रूप से भारत का मोर्चा मजबूत रहा है। हालांकि मौजूदा उपलब्धियों और अन्य देशों के प्रदर्शन के आलोक में देखें तो भारत को अभी काफी प्रयास करना होगा लेकिन इस आयोजन में हासिल उपलब्धियां और प्रदर्शन का स्तर भविष्य की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए उम्मीद के वाहक हैं। आमजन की यह उम्मीद होती है कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि उनकी समस्याओं, चिंताओं एवं जरूरतों को संसद में रखेंगे और उन पर विचार-विमर्श के बाद एक सक्षम कानून या योजना बनाई जाएगी।





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