निर्गुण भक्ति के दोहों से गूंज उठी वामा साहित्य मंच की मासिक गोष्ठी

इंदौर। जीवन के गूढ़ अर्थों को उद्घाटित करने वाले निर्गुण भक्ति के संतों और कवियों के दोहों की प्रस्तुतियों से वामा साहित्य मंच की मासिक गोष्ठी गूंज उठी। ‘मोको कहां ढूंढे रे बन्दे’ विषय पर आयोजित इस साहित्यिक बैठक में भक्तिकालीन संतों के दोहों के माध्यम से जीवन, सत्य, समरसता और आत्मचिंतन के संदेश को रेखांकित किया गया।

कबीर जन-जागरूकता आंदोलन से जुड़े सुरेश पटेल के मुख्य आतिथ्य में कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। प्रतिमा जाट ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की, जबकि कबीर पंथ की गायिका अंजना सक्सेना ने मधुर भजनों की प्रस्तुति देकर वातावरण को भक्तिमय बना दिया। संस्था की उपाध्यक्ष वैजयंती दाते ने शब्द-पुष्पों से अतिथियों और उपस्थित साहित्यप्रेमियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि दोहे के सीमित शब्दों में भी बहुत कुछ कहने की असीम शक्ति होती है। यह जनमानस की चेतना को झकझोरकर बदलाव की बयार बहाने में सक्षम है।

कबीर के विचार आज भी प्रासंगिक : सुरेश पटेल

मुख्य अतिथि सुरेश पटेल ने कहा कि कबीर के विचार तब तक जीवित रहेंगे, जब तक स्त्रियों के कंठ में श्वास है। उन्होंने ज्ञानमार्गी महिला संतों में मीरा, गार्गी, मैत्रेयी और सहजोबाई का उल्लेख करते हुए ललेश्वरी को कश्मीरी भाषा को नए शब्द देने वाली संत बताया।

उन्होंने कहा कि संतों ने ज्ञान और समरसता की परंपरा को आगे बढ़ाया। कबीर जुलाहे, रैदास जूते बनाने वाले और दादू रुई धुनकने का काम करते थे, लेकिन उन्होंने अपने कर्म को कभी नहीं छोड़ा। वे गांव-गांव गए और सामाजिक समरसता का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि कबीर केवल भारत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनके विचार वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक हैं। प्रकृति, पेड़ और नदियां जब भेद नहीं करते तो मनुष्य को भी भेदभाव से ऊपर उठना चाहिए।

इस अवसर पर क्रांति चतुर्वेदी और अनिल कर्मा ने भी कार्यक्रम में सहभागिता की। क्रांति चतुर्वेदी ने कहा कि वे वामा साहित्य मंच की सदस्याओं के विचारों और गतिविधियों से निरंतर जुड़े रहते हैं। अनिल कर्मा ने कबीर को केवल संत के रूप में न देखकर पत्रकार के रूप में भी देखने की बात कही। उन्होंने कहा कि खबर और सत्य के बीच का अंतर जितना कम होगा, पत्रकारिता उतनी ही सत्य के करीब पहुंचेगी।

दोहों के माध्यम से रखे विचार

कार्यक्रम में मंच से जुड़ी लेखिकाओं ने कबीर और निर्गुण भक्ति परंपरा के विभिन्न दोहों की विवेचना की। श्रुति शर्मा ने ‘माला फेरत युग गया’, डॉ. भावना बर्वे ने ‘काठ की पुतली’, मृदुला शर्मा ने ‘हमन है इश्क मस्ताना’, सृष्टि उपाध्याय ने ‘बुरा जो देखन मैं चला’, आशीष होरा ने ‘शबद कोई बोले राम-राम’, डॉ. शोभा प्रजापति ने ‘दुर्बल को न सताइए’ और भावना दामले ने ‘ऐसा चाहूं राज मैं’ की व्याख्या की।

इसी क्रम में अमिता मराठे ने ‘कबीर कूता राम का’, सुषमा शर्मा श्रुति ने ‘ऐसी वाणी बोलिए’, पद्मा धर्माले ने ‘मत कर माया को अहंकार’, आशा मानधन्या ने ‘ऐसी बानी बोलिए’, आशा गर्ग ने ‘जब मैं था तब हरि नहीं’, डॉ. आराधना तिवारी ने ‘पाहन पूजे हरि मिले’, बिंदु मेहता ने ‘संत न छोड़ें संत’, जयश्री उपाध्याय ने ‘नहाए धोए क्या हुआ’, आशा मुंशी ने ‘धीरे-धीरे रे मना’, रेखा पाठक ने ‘करम बंधन में बंध रयो’, अनीता जोशी ने ‘चाह गई, चिंता गई’ तथा माधवी तारे ने ‘मन लाग्यो यार फकीरी में’ दोहों को विवेचित किया।

कार्यक्रम की संयोजक कविता अर्गल एवं अवंति श्रीवास्तव रहीं। सूत्रधार की भूमिका निधि जैन ने निभाई, जबकि आभार अनुपमा गुप्ता ने व्यक्त किया। कार्यक्रम में मंच से जुड़ी अनेक सदस्याओं की गरिमामयी उपस्थिति रही।

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