सुप्रीम कोर्ट ने आर्ट ऑफ लिविंग को यमुना बाढ़ क्षेत्र को पर्यावरणीय नुकसान पहुंचाने के आरोपों से मुक्त किया

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने 2016 के वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल से जुड़े यमुना बाढ़ क्षेत्र में पर्यावरणीय क्षति के मामले में आर्ट ऑफ लिविंग को बड़ी राहत दी है। न्यायालय ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के पूर्व निर्णय को निरस्त करते हुए उससे जुड़ी परिणामी अंतरिम कार्रवाइयों को भी समाप्त कर दिया।

न्यायालय के निर्णय का अहम पहलू यह है कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा आयोजित वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल से यमुना के बाढ़ क्षेत्र को पर्यावरणीय नुकसान होने की बात साबित नहीं होती।

₹5 करोड़ की राशि लौटाने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा जमा कराई गई ₹5 करोड़ की राशि वापस करने का निर्देश दिया। संस्था की ओर से कहा गया कि इस राशि को गलत तरीके से ‘जुर्माना’ बताया जाता रहा, जिससे उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।

155 से ज्यादा देशों ने लिया था हिस्सा

2016 में आयोजित वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल को बड़े वैश्विक आयोजनों में शामिल किया गया था। आयोजकों के मुताबिक इसमें 155 से अधिक देशों की सहभागिता रही और करीब 35 लाख लोग प्रत्यक्ष रूप से शामिल हुए थे। आयोजन की अध्यक्षता भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर.सी. लाहोटी ने की थी।

संस्था के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र के छठे महासचिव दिवंगत डॉ. बुतरस बुतरस-घाली भी आयोजन के सह-अध्यक्ष बनने वाले थे, लेकिन कार्यक्रम से करीब एक महीने पहले उनका निधन हो गया।

आर्ट ऑफ लिविंग ने फैसले का स्वागत किया

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आर्ट ऑफ लिविंग के आधिकारिक प्रवक्ता ने कहा कि संस्था पर लगाए गए आरोप निराधार थे और अब न्यायालय के फैसले से स्थिति स्पष्ट हो गई है। प्रवक्ता ने कहा कि संस्था लंबे समय से पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के संवर्धन के लिए काम कर रही है।

नोट: यह खबर उपलब्ध कराई गई सामग्री के आधार पर पुनर्लेखित है। इसमें संस्था की ओर से किए गए दावों को उसी रूप में प्रस्तुत किया गया है।

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