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सिचुएशनशिप’ से ‘सोलमेट’ तक, Gen Z के हर सवाल का गुरुदेव ने दिया जवाब

बेंगलुरु। कोरियन हार्ट इमोजी के अर्थ से लेकर रात दो बजे तक चलने वाली अतिशय सोच, ‘सिचुएशनशिप’ से ‘सोलमेट’ और FOMO तक—Gen Z के मन में उठने वाले तमाम सवालों पर गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर ने सहज, आत्मीय और हास्यपूर्ण अंदाज में अपनी बात रखी। आर्ट ऑफ लिविंग के यूथ डेस्क की ओर से आयोजित सातवें नेशनल इंडक्शन प्रोग्राम में देशभर के 1,300 से अधिक उच्च शिक्षण संस्थानों के हजारों प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों ने गुरुदेव के साथ संवाद किया।

IIT, IIM, NIT और AIIMS जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के विद्यार्थियों ने जीवन, रिश्तों, करियर, मानसिक स्थिरता, सोशल मीडिया और भविष्य को लेकर बेबाक सवाल पूछे। जब एक विद्यार्थी ने पूछा कि जीवन में ‘सिचुएशनशिप’ चुननी चाहिए या ‘सोलमेट’ की तलाश करनी चाहिए, तो गुरुदेव ने सवाल को दूसरे नजरिए से देखने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि स्वयं को दूसरे व्यक्ति की जगह रखकर सोचिए। यदि आप किसी को जीवनसाथी मानें और वह आपको केवल ‘सिचुएशनशिप’ के रूप में देखना चाहे तो आपको कैसा लगेगा?

जीवन में सब ठीक होने पर भी खालीपन क्यों?’

कश्मीर की एक छात्रा ने बताया कि जीवन में सब कुछ ठीक होने के बावजूद भीतर निरर्थकता का अनुभव होता है। गुरुदेव ने कहा कि यह केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं, बल्कि आज दुनिया के अनेक युवाओं के भीतर चल रहा संघर्ष है। उन्होंने अकेलेपन और निरर्थकता से बाहर निकलने के लिए श्वास पर ध्यान देने और भीतर की शांति से जुड़ने का संदेश दिया।

उन्होंने युवाओं से अपनी जिज्ञासा और जीवंतता बनाए रखने का आह्वान करते हुए कहा, “शरारती बने रहिए। यही युवावस्था की पहचान है।” हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी शरारत किसी दूसरे के लिए पीड़ा का कारण नहीं बननी चाहिए।



असफलता से घबराएं नहीं

गुरुदेव ने युवाओं को उनकी क्षमता का अहसास कराते हुए कहा कि दुनिया में जहां भी उत्कृष्ट प्रतिभाएं दिखाई देती हैं, वहां अक्सर भारतीय युवाओं की मौजूदगी मिलती है। इंजीनियरिंग, चिकित्सा, कंप्यूटर विज्ञान, फैशन और हॉस्पिटैलिटी सहित विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय युवा अपनी पहचान बना रहे हैं।

उन्होंने युवाओं को “बाहर से दृढ़ और भीतर से लचीला” व्यक्तित्व विकसित करने की सलाह दी। उनके अनुसार दृढ़ता का अर्थ असफलता या संदेह से मुक्त होना नहीं, बल्कि असफलताओं और अनिश्चितताओं के बावजूद आगे बढ़ते रहना है। उन्होंने कहा कि शुरुआती असफलताएं भविष्य की बड़ी उपलब्धियों का रास्ता भी बन सकती हैं, इसलिए स्वयं पर विश्वास बनाए रखना जरूरी है।

30 सेकंड रह गई ध्यान की अवधि

सोशल मीडिया और छोटे-छोटे वीडियो के दौर में एकाग्रता की घटती क्षमता पर भी गुरुदेव ने चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पहले लोगों की ध्यान अवधि 40-50 मिनट तक हुआ करती थी, जबकि आज यह घटकर करीब 30 सेकंड रह गई है।

उन्होंने इसका समाधान तनाव कम करने में बताया। उनके अनुसार जब व्यक्ति भीतर से तनावमुक्त होता है तो ऊर्जा बढ़ती है और एकाग्रता भी स्वाभाविक रूप से बेहतर होती है।

क्रोध को खुद की सजा न बनने दें

भावनात्मक तनाव और क्रोध से निपटने के सवाल पर उन्होंने हास्य को जीवन का हिस्सा बनाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि क्रोध वह दंड है, जो व्यक्ति स्वयं को देता है। क्रोध आने पर कुछ गहरी सांसें लेने, परिस्थिति से थोड़ा पीछे हटने और उसे हास्य के नजरिए से देखने की कोशिश करनी चाहिए।

सोशल मीडिया की हर बात सच नहीं

सोशल मीडिया और AI के बढ़ते प्रभाव के बीच गुरुदेव ने युवाओं को सावधान करते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली हर चीज को सच नहीं मानना चाहिए। उन्होंने कहा कि बहुत-सी सामग्री गलत होती है और आज बड़ी मात्रा में सामग्री AI से भी तैयार की जा रही है। ऐसे में युवाओं को जानकारी को परखने के लिए विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए।

अच्छा दोस्त वह, जो आपको FOMO से बाहर निकाले’

FOMO यानी दूसरों से पीछे छूट जाने के डर पर गुरुदेव ने दोस्ती की एक चुटीली परिभाषा दी। उन्होंने कहा, “अच्छा मित्र वह है, जिसके साथ बात करके आप FOMO से बाहर आ जाएं। आप ZOMO में जिएं और दूसरों को FOMO दें।” इस बात पर सभागार तालियों और हंसी से गूंज उठा।

पूरे संवाद का संदेश यही रहा कि युवाओं को अपनी महत्वाकांक्षाओं और सवालों से पीछे हटने की जरूरत नहीं है। उन्हें सपने देखने, प्रयोग करने, असफलताओं से सीखने और अपनी जिज्ञासा को जीवित रखने के साथ-साथ भीतर की शांति, ऊर्जा और करुणा को भी बनाए रखना चाहिए। गुरुदेव ने युवाओं को संदेश दिया कि सफलता की दौड़ में खुद को न खोएं और जीवन की जीवंतता को हमेशा बनाए रखें।

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