भरोसे की जरूरत
राजीव त्यागी
वर्तमान स्थिति से असंतुष्ट होने पर ही आक्रोश पैदा होता है। शिक्षा विकासशील भारत के लिए एक आधारभूत नींव है, जब यही नींव लड़खड़ाने लगे तो युवा शक्ति निराश होकर कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार हो जाती है। युवाओं के लिये यह समय परीक्षाओं का समय होता है। उन्हें ऐसे समाधान देने पड़ते हैं जो उनके भरोसे और विश्वास का जीता-जागता प्रतीक बन सके।जब भरोसा ही खत्म होने लगे, आधारभूत नींव हिलती नजर आने लगती है।
समस्या शिक्षा व्यवस्था के ढांचे पैदा हो गई त्रुटियों के साल-दर-साल न सुधरने से पैदा हुई। पेपर लीक का यह मसला इस सरकार के दौरान पैदा नहीं हुआ, इसके पीछे देश से शिक्षा व्यवस्था के अक्षम होते जाने का कारण भी था। जो त्रुटियां पैदा हो जाती हैं, उन्हें सही क्यों नहीं किया जाता, यह सवाल भी था। इस सवाल के समाधान के लिए त्वरित एक्शन की जगह अगर बातूनी संतोष मिलेगा तो युवाओं का गुस्सा व्यापक स्तर पर फैलता नजर आएगा। जंतर-मंतर का धरना इसलिए हुआ क्योंकि लाखों नौजवानों को अपनी शिक्षा की परिणति व परीक्षा के अर्थहीन होने का संकट नजर आने लगा। यही कारण है कि दिल्ली में ही नहीं बल्कि बिहार के अलग-अलग स्थानों, जयपुर और जम्मू से लेकर महाराष्ट्र तक युवाओं का गुस्सा सड़कों पर नजर आता है। भरोसा यूं बिगड़ता है कि तत्काल संवाद स्थापित न होने की जगह जिस नियंत्रक पुलिस को उतारा जाता है, उसकी अमानवीयता की शिकायतें आने लगती हैं।
उधर राजनीति संवाद की स्थिति में आने की बजाय गतिरोध की स्थिति में आ जाती है। संसद का मानसून सत्र चल रहा है और लगातार काम नहीं हंगामा होता रहा है। विचार नहीं, आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं। आज समय की मांग है कि युवाओं का देश की व्यवस्था में विश्वास पैदा किया जाए। आज शिक्षा के मूलभूत ढांचे और पढ़ने-पढ़ाने और परीक्षा की व्यवस्था करने वाले लोगों की मनोवृत्ति में भी परिवर्तन करने की जरूरत है। यह भी सोचना चाहिए शिक्षा का दायित्व केवल सरकार का नहीं है। परिवार, समाज, उद्योग, शिक्षण संस्थान और स्वयं विद्यार्थी भी समान रूप से जिम्मेदार हैं।अभिभावकों को बच्चों पर केवल अंक लाने का दबाव नहीं डालना चाहिए, बल्कि उनकी रुचि और क्षमता को समझना चाहिए। समाज को विद्यालयों से जुडऩा होगा और उद्योग जगत को शिक्षा एवं कौशल विकास में निवेश बढ़ाना होगा।
यदि भारत को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाना है तो सबसे बड़ा निवेश शिक्षा में करना होगा। सड़कें, पुल, हवाई अड्डे और उद्योग महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनसे भी अधिक महत्वपूर्ण वह मानव संसाधन है जो इन सबका निर्माण करता है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली, सक्षम शिक्षक, आधुनिक पाठ्यक्रम, मजबूत सरकारी विद्यालय, विश्वस्तरीय शोध संस्थान और समान अवसर—यही विकसित भारत की वास्तविक पहचान होंगे।





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