राजनीति: देश सेवा का संकल्प और आज की हकीकत

- राजेन्द्र लाहिरी
राजनीति को किसी भी लोकतांत्रिक देश की आत्मा माना जाता है। अरस्तू से लेकर चाणक्य तक, सभी विचारकों ने राजनीति को समाज कल्याण और राष्ट्र निर्माण का सबसे सशक्त माध्यम बताया है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में जब हम 'राजनीति' शब्द का विश्लेषण करते हैं, तो इसका मूल अर्थ 'राज' (शासन) और 'नीति' (उचित व्यवहार या नियम) से जुड़ता है, जिसका अंतिम उद्देश्य लोक-कल्याण ही है।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस और डॉ. बी.आर. आंबेडकर जैसे महापुरुषों ने राजनीति को 'देश सेवा के संकल्प' के रूप में अपनाया। परंतु, आजादी के आठ दशकों बाद आज की समकालीन राजनीति का चेहरा इस मूल संकल्प से काफी दूर, 'हकीकत' के एक अलग धरातल पर खड़ा दिखाई देता है।
देश सेवा का संकल्प: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत का स्वतंत्रता आंदोलन राजनीति और देश सेवा के अनूठे संगम का सबसे बड़ा उदाहरण है। उस दौर में राजनीति में कदम रखने का सीधा मतलब था—त्याग, तपस्या और जेल की सलाखें। नेताओं का एकमात्र संकल्प भारत को औपनिवेशिक दासता से मुक्त कराना और एक ऐसे समतामूलक समाज की स्थापना करना था, जहाँ हर नागरिक को न्याय, स्वतंत्रता और समानता मिल सके।संविधान सभा के गठन के समय भी यही संकल्प सर्वोपरि था। हमारे नीति-निर्माताओं ने एक ऐसा ढांचा तैयार किया जो अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति (अंत्योदय) के कल्याण को सुनिश्चित कर सके। उस समय राजनीति कोई पेशा या व्यवसाय नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना थी।

वर्तमान हकीकत: संकल्प से भटकाव
आज की राजनीति का अवलोकन करने पर 'संकल्प' और 'हकीकत' के बीच एक गहरी खाई नजर आती है। वर्तमान समय में राजनीति के मायने और काम करने के तरीके पूरी तरह बदल चुके हैं। आज राजनीति का मुख्य उद्देश्य 'देश सेवा' के बजाय किसी भी तरह 'सत्ता प्राप्ति' बन गया है। नीतियां जनकल्याण को ध्यान में रखकर बनाने के बजाय वोट बैंक को सुरक्षित करने के लिए बनाई जाने लगी हैं।अपराधीकरण और धनबल: चुनाव लड़ना आज बेहद खर्चीला हो चुका है। राजनीति में बाहुबल और धनबल का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। कई बार योग्य और सेवाभावी उम्मीदवार संसाधनों की कमी के कारण पीछे छूट जाते हैं, जबकि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग संसद और विधानसभाओं तक पहुँच जाते हैं।

वैचारिक शून्यता
पहले राजनीति विचारधाराओं की लड़ाई होती थी। आज सिद्धांतों की जगह अवसरवाद ने ले ली है। व्यक्तिगत स्वार्थ और सत्ता के लिए पाला बदलना (दलबदल) आम बात हो चुकी है।ध्रुवीकरण की नीति: समाज को जोड़ने के बजाय, मतों के ध्रुवीकरण के लिए जाति, धर्म और क्षेत्रीयता की भावनाओं को भड़काया जाता है। इससे सामाजिक ताना-बाना कमजोर होता है।हकीकत का दूसरा पहलू: सकारात्मक बदलाव ऐसा नहीं है कि वर्तमान राजनीति पूरी तरह नकारात्मकताओं से घिरी है। हकीकत का एक दूसरा और उज्ज्वल पहलू भी है, जो देश सेवा के संकल्प को जीवित रखता है।

नीतिगत और बुनियादी विकास
 हाल के वर्षों में भारत ने बुनियादी ढांचे (सड़कें, डिजिटल कनेक्टिविटी, बिजली) और लोक-कल्याणकारी योजनाओं (मुफ्त राशन, स्वास्थ्य बीमा, आवास योजनाएं) के मामले में अभूतपूर्व प्रगति की है। यह राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना संभव नहीं था। आज भारत की विदेश नीति अधिक स्वतंत्र और मजबूत हुई है। वैश्विक मंचों पर भारत की आवाज को सम्मान से सुना जाता है, जो देश के राजनीतिक नेतृत्व की कुशलता को दर्शाता है।राजनीति में पढ़े-लिखे युवाओं और तकनीक का उपयोग बढ़ा है।

शासन में पारदर्शिता लाने के लिए डिजिटल माध्यमों का प्रयोग किया जा रहा है, जिससे भ्रष्टाचार पर सीधे लगाम लगी है।सुधार की राह और हमारी भूमिकासंकल्प और हकीकत के इस अंतर को पाटने के लिए केवल राजनेताओं को दोष देना काफी नहीं है। लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन होती है। जब तक नागरिक जागरूक नहीं होंगे, तब तक राजनीति में सुधार संभव नहीं है।

मूल्य आधारित मतदान
मतदाताओं को जाति, धर्म या मुफ्त के उपहारों के प्रलोभन से ऊपर उठकर उम्मीदवार की योग्यता, शिक्षा और उसके चरित्र के आधार पर वोट देना चाहिए।आंतरिक लोकतंत्र: राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र होना अनिवार्य है, ताकि वंशवाद के बजाय जमीन से जुड़े सच्चे कार्यकर्ताओं को आगे आने का मौका मिले।

चुनावी सुधार
 चुनाव आयोग को धनबल और फर्जी खबरों पर लगाम लगाने के लिए और अधिक सख्त कदम उठाने होंगे। राजनीति अपने आप में बुरी नहीं है,यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसे चलाने वाले लोग और इसे चुनने वाली जनता कैसी है। 'देश सेवा का संकल्प' एक आदर्श स्थिति है, जबकि 'आज की हकीकत' व्यावहारिक चुनौतियों से भरी है। यदि हमें भारत को एक विकसित और समृद्ध राष्ट्र बनाना है, तो राजनीति को वापस सेवा के उसी मार्ग पर लाना होगा जिसका सपना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था। हकीकत को संकल्प के करीब लाना ही सच्चे लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत होगी।
(लेखक पामगढ़ छग से हैं)


No comments:

Post a Comment

Popular Posts