इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

 विवाहित पुरुष का दूसरी महिला के साथ सहमति से 'लिव इन' में रहना अपराध नहीं

प्रयागराज: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि न्याय करते समय कानून और सामाजिक नैतिकता को एक-दूसरे से अलग रखना अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि यदि दो वयस्क अपनी स्वतंत्र इच्छा से साथ रह रहे हैं, तो केवल सामाजिक धारणाओं या नैतिकता के आधार पर उनके अधिकारों को बाधित नहीं किया जा सकता।

यह मामला शाहजहांपुर के एक लिव-इन कपल, अनामिका और नेत्रपाल की याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे वयस्क हैं और अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं, लेकिन अनामिका के परिजनों से उन्हें 'ऑनर किलिंग' का खतरा है। विपक्षी पक्ष के वकील ने दलील दी कि नेत्रपाल विवाहित है, इसलिए उसका किसी अन्य महिला के साथ रहना अपराध है। इस तर्क को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने साफ कहा कि ऐसा कोई कानून नहीं है जो एक विवाहित व्यक्ति को किसी वयस्क के साथ उसकी सहमति से रहने पर अपराधी घोषित करे।

अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी चिंता जताई और शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक (SP) को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए प्रेमी जोड़े को तत्काल सुरक्षा मुहैया कराने का आदेश दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को केस अपराध संख्या 4/2026 के तहत गिरफ्तार न किया जाए और परिवार की ओर से उन्हें कोई शारीरिक नुकसान न पहुंचे। मामले की अगली सुनवाई 8 अप्रैल 2026 को निर्धारित की गई है। कोर्ट की इस टिप्पणी ने संवैधानिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा को एक नई मजबूती दी है।

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