मैनपुरी के सूरज तिवारी  के हौसलों को सलाम 

 ट्रेन हादसे में गंवाए दोनों पैर और हाथ, फिर भी यूपीएससी  में हासिल की तीसरी रैंक

लखनऊ।  मैनपुरी जिले के एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले सूरज तिवारी ने अपनी अटूट इच्छाशक्ति से इतिहास रच दिया है। वर्ष 2017 में गाजियाबाद के दादरी में हुए एक ट्रेन हादसे में सूरज ने अपने दोनों पैर, एक हाथ और दूसरे हाथ की दो उंगलियां खो दी थीं।मात्र 21 वर्ष की आयु में हुए इस भीषण हादसे के बावजूद उन्होंने जीवन से हार नहीं मानी और संघर्ष को अपनी ताकत बनाया।अपनी शारीरिक सीमाओं को चुनौती देते हुए उन्होंने यूपीएससी की कठिन परीक्षा उत्तीर्ण कर प्रशासनिक सेवा में जाने का गौरव हासिल किया है।

संघर्ष को अपनी ताकत बनाया: सूरज का जीवन दुखों और चुनौतियों की एक लंबी दास्तान रहा है, लेकिन उनका संकल्प हिमालय जैसा अडिग रहा। जिस समय वे रेल दुर्घटना के गहरे जख्मों से उबरने की कोशिश कर रहे थे, तभी एक अन्य हादसे में उनके भाई की असामयिक मृत्यु हो गई।इन तमाम विपरीत परिस्थितियों और मानसिक आघात के बीच उनके माता-पिता ने उन्हें निरंतर पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित किया. सूरज ने कभी भी अपनी शारीरिक अक्षमता को अपने सपनों के आड़े नहीं आने दिया और अपनी पढ़ाई को पूरी गंभीरता के साथ जारी रखा।

आकाशवाणी से IIS तक का सफर

 सूरज तिवारी को तीन साल पहले पहली बार यूपीएससी में सफलता मिली थी, जिसके आधार पर उन्हें इंडियन इंफॉर्मेशन सर्विस (IIS) आवंटित हुई थी। वर्तमान में वे आकाशवाणी लखनऊ केंद्र में समाचार अनुभाग के प्रभारी (निदेशक पद) के रूप में कार्यरत हैं और अपनी प्रोन्नति की प्रतीक्षा कर रहे हैं।बेहतर रैंकिंग की चाह में उन्होंने इस वर्ष पुनः परीक्षा दी और शानदार प्रदर्शन करते हुए अपने वर्ग में तीसरा स्थान प्राप्त किया है। इस बड़ी कामयाबी के बाद अब उन्हें निकट भविष्य में बेहतर कैडर और उच्च प्रशासनिक पद मिलने की पूरी उम्मीद है।

युवाओं के लिए प्रेरणा बने सूरज: 

सूरज तिवारी ने कहा कि संघर्ष हर व्यक्ति के जीवन में होता है, चाहे वह शारीरिक रूप से सामान्य हो या नहीं. उनकी मुस्कुराहट और सकारात्मक सोच आज उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो छोटी-छोटी कठिनाइयों से घबराकर अपने लक्ष्यों से पीछे हट जाते हैं।सूरज का मानना है कि शिक्षा ही वह एकमात्र माध्यम है जो व्यक्ति को हर बाधा से पार ले जाकर ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है। हार मानना उनके जीवन के शब्दकोश में कभी विकल्प रहा ही नहीं, और आज उनकी सफलता इसका जीवंत प्रमाण है। 

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