कवलजीत सिंह
ऑनलाइन गेमिंग की लत एवं आभासी दुनिया कितनी भयावह एवं ऑनलाइन काफी पातक साबित हो रही है। धीरे-धीरे किशोरों को अपनी चपेट में लेने वाली यह प्रवृत्ति कितनी हृदयविदारक हो सकती है, उसका उदाहरण गाजियाबाद की तीन अल्पवयस्क बहनों की आत्महत्या से पता चलता है। ऐसी ही घटना हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में भी घटी जहां एक पंद्रह वर्षीय किशोर ने ऑनलाइन गेम के अपने एक विदेशी साथी के बिछुड़ने के गम में घर में आत्महत्या कर ली। किशोर दसवीं का छात्र था।
इन घटनाओं ने समाज को स्तब्ध ही नहीं किया, बल्कि भीतर तक गहरा घाव दिया है। यह कोई आकस्मिक घटना नहीं है। इससे पहले झाबुआ, भोपाल और देश के अन्य हिस्सों में सामने आई ऐसी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि आभासी दुनिया किस तरह वास्तविक जीवन पर हावी होती जा रही है और हम अनजाने में एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जहां संवेदनाएं, संवाद और जीवन-मूल्य स्क्रीन के पीछे दम तोड़ते जा रहे हैं। ऑनलाइन गेमिंग अपने आप में अपराध नहीं है, न ही तकनीक शत्रु है, लेकिन जब यह बच्चों और किशोरों के लिए लत बन जाए, तो यह एक धीमा जहर बन जाती है।
यह जहर चुपचाप बच्चों के मस्तिष्क में प्रवेश करता है, उनकी सोच, उनकी भावनात्मक संरचना और उनके निर्णय लेने की क्षमता को विकृत करता है। गेमिंग की दुनिया बच्चों को तात्कालिक रोमांच, आभासी जीत और काल्पनिक पहचान देती है, लेकिन धीरे-धीरे वही दुनिया उन्हें वास्तविक जीवन से काट देती है। परिवार, मित्र, पढ़ाई, प्रकृति, खेल और संवाद-सब कुछ पीछे छूटने लगता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अत्यधिक ऑनलाइन गेमिंग बच्चों के मस्तिष्क में आवेग नियंत्रण को कमजोर करती है। जोखिम का आकलन करने की क्षमता घटती है और भावनात्मक अस्थिरता बढ़ती है। हार, असफलता या गेम से वंचित किए जाने की स्थिति में अवसाद, क्रोध और निराशा गहराने लगती है। कई बार बच्चे आत्महत्या जैसे चरम कदम को भी एक 'गेम ओवर' की तरह देखने लगते हैं। सवाल है कि ऐसे आनलाइन खेलों की अनुमति कैसे दे दी जाती है, जो किसी बच्चे के जीवन को खतरे में डाल दे या फिर उसकी मौत का कारण बन जाए?





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