प्रहरी हैं हम... !
- ललिता जोशी
किसी समाज या देश की सुरक्षा उसके प्रहरियों के हाथ में होती है । देश सुरक्षित होगा तो तभी उसका विकास और प्रगति होगी । ये प्रहरी सेनाओं के होते हैं। जो हमारी सीमाओं की रक्षा करते हैं और हम देश में चैन की नींद सोते हैं ।ऐसे ही प्रत्येक राज्य में पुलिस होती है जो अपने राज्य के लोगों को कानून और व्यवस्था प्रदान करके उन्हें सुरक्षा प्रदान करते हैं।एक मोहल्ले का रक्षक एक चौकीदारसेलेकर एक श्वान और सीसीटीवी कैमरा है ।जिससे अवांछनीय तत्वों को रोका जा सके और अगर अवांछनीय तत्व घुसपैठ कर भी जाए तो उसकी धरपकड़ की जा सके । कितनी महत्वपूर्ण है प्रहरी की भूमिका।
जनता का भरोसा इन तथाकथित प्रहरियों पर और प्रहरियों का भरोसा सिर्फ वोटबैंक पर । बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ का नारा इतना बुलंद कि उसके नीचे बच्चियाँ का कोमल मन और तन दब कर कराह रहा है । रोज न जाने कितनी बच्चियों को वहशियों की दरिंदगी का शिकार बन जाती और इनकी लाशें या तैरती हुई मिलती या फिर जमीन में गड़ी हुई मिलती हैं । इतना ही नहीं आज भी दुधमुंही बच्चियों को यूं ही लावारिस छोड़ दिया जाता है कचरे के डिब्बों में या मंदिरों की सिढ़ियों पर मिलती हैं । तब ये मीडिया की सुर्खियोंमें छा जाती हैं और मीडिया की टी आर पी बढ़ जाती है ।ये प्रहरी अपने भावी वोट बैंक की सुरक्षा के लिए कुछ करने की नीयत केवल वादों और नारों तक सिमट कर रह जाती है ।
जनता को मुफ्त में राशन किट और सेहत कार्ड बनवा दो । जमीनी हकीकत क्या है ? ये भी आए दिन अखबारों और न्यूज़ चैनलों में छाया रहता है । अस्पतालों के बाहर इलाज के लिएअपनी बारी की इंतज़ार में सड़कों पर पड़े बीमार और उनके तीमारदारों की लाइन देख कर स्वत ही ज्ञात हो जाता है कि हमारी स्वास्थ्य सेवाओं में आम आदमी की हालत कितनी दयनीय है । हमारे प्रहरी लोकतन्त्र को बचाए रखने के लिए स्वयं सभी सुविधाओं का उपयोग करते हैं । आम आदमी विषाक्त पानी पीने को मजबूर है और अपने प्राण गवाने के लिए वचनबद्ध है । खांसी के इलाज के नाम पर कफ सिरप के इस्तेमाल से बच्चों की मृत्यु । ऐसे न जाने कितने ही भयानक सत्य हैं । जिनको याद करने मात्र से शरीर में सिहरन दौड़ जाती है । सरकारी स्कूल विज्ञापनों में बड़े ग्लेमरस दिखाये जाते हैं इमारत भव्य बच्चों को पढाने वाले अध्यापक हैं ही नहीं इन शिक्षा के मंदिरों में तो बेचारे माता-पिता फिर अपने बच्चों को शिक्षा के लिए प्राइवेट स्कूलों में भेजते हैं ताकि उनके बच्चों का भविष्य उज्ज्वल हो । बेचारे माता-पिता इन स्कूलों की मनमानी फीस के बोझ तले दबते हैं । वैसे तो नई शिक्षा नीति में शिक्षा का अधिकार है लेकिन कितने बच्चे स्कूल जाते हैं ।
अभी तो युवा रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं लेकिन अपने देश में लोकतन्त्र के प्रहरी धार्मिक आयोजनों की चकचौंध से जनता को भरमाते हैं। देश की जनता मंहगाई से जूझ रही है । प्रहरी अपनी बयानबाजी में मस्त है। लोकतन्त्र के प्रहरियों को पेंशन चाहिए लेकिन बाकी सरकारी कार्मिकों को जो 25 -26 वर्षों तक सरकार को अपनी सेवाएँ दे उनको पेंशन देने में अम्मा मरतीहै ।
कभी प्रहरी जी अपने वोटों की चिंता होती है तो वो लोगों को उनके मताधिकार की रक्षा के नाम पर स्वयं ही कोर्ट में पहुँच कर वकील की तरह जिरह करने पहुँच जाते हैं और उसकी लाइव प्रसारण भी दिखाया गया । लेकिन जब लड़कियों का बलात्कार होता है ये सजगता अदृश्य होती है । प्रहरी अपनी निष्ठा को अपनी आवश्यकतानुसार सिद्ध करना चाहते हैं ताकि उनका वोटबैंक बना रहे । ये हैं हमारे लोकतन्त्र के सजग प्रहरी ।
ये प्रहरी इतने जानदार और शानदार हैं कि इनका कहना ही क्या ! जनता को महंगाई ,बेरोजगारी ,मिलावट ,प्रदूषण,खराब हवा,गंदा पानी ,टूटी सड़कें ,खुले मेनहोल ,पानी में गाड़ी सहित डूबता हुआ इंजीनियर उसे देखते हुए उसके बेबस पिता । अनियंत्रित हवाई कंपनियों से परेशान हवाई यात्री ,जान जोखिम में डालकर यात्रा करते हैं अपने देश में हवाई यात्री । अपने प्रहरियों का उत्सव तो बस चुनाव जितना है । इनकी होली और दीपावली तो चुनाव जीतने पर मनाई जाती है।
प्रहरियों की संताने विदेशों में अध्ययन करती हैं और धंधे भी । आम आदमी का संघर्ष सिर्फ अपने और अपने परिवार के अस्तित्व को बचाने के लिए ताउम्र चलता है । ऐसे न जाने कितने ही उदाहरण भरे पड़े हैं अपने यहाँ । कभी कभी तो लगता है ये प्रहरी नहीं कोई जादूगर हैं जो मुफ्त की योजनाओं का ब्रह्मास्त्र छोड़कर सभी अपनी मुट्ठी में कर लेते हैं । जनता के पैसे से केवल समाज के कुछ पक्षों को सुविधा मिलती है बाकी तो स्वयं ही जद्दोजहद में लगे रहते हैं । ये लोकतन्त्र के प्रहरी स्वयं को पुष्पित और पल्वित करते हैं ।
(मुनिरका एंक्लेव, दिल्ली)




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