प्राथमिक शिक्षा में स्किल और मूल्यपरक तत्व जरूरी

- प्रो. नंदलाल
प्राथमिक शिक्षा किसी भी देश के भविष्य को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।यह शिक्षा और विकास की नींव है और रीढ़ भी है।सर्वाधिक ध्यान इस शिक्षा पर दिया जाना चाहिए। किसी देश की प्राथमिक शिक्षा यदि व्यवस्थित है तो फिर चिंता करने की विशेष बात नहीं होती। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने प्रारंभिक शिक्षा के लिए जो पृष्ठभूमि सैद्धांतिक रूप से तैयार की है वह अच्छी है पर व्यावहारिक रूप से कितना लागू हो पा रहा है और उसके लिए क्या प्रयास हो रहे हैं, इसका आकलन अभी बाकी है।

प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे एकदम नाजुक और निष्कलंक होते हैं जिनके मन मस्तिष्क पर किसी पूर्वाग्रह या रूढ़ि का प्रभाव नहीं होता।वे वातावरण में उपलब्ध ज्ञान को अर्जित करने विद्यालय आते हैं। विद्यालय कुम्हार की चकरी और आंवा होते हैं। गुरु कुम्हार होता है और बच्चों को गढ़ता है पकाता है।अब निर्भर करता है विद्यालयीन व्यवस्था और वहां के शैक्षणिक माहौल पर जहां हर अभिभावक यह उम्मीद लगाए रहता है कि उनका बच्चा वहां अच्छी शिक्षा पाएगा जिससे उसका व्यक्तित्व और भविष्य दोनों निखरेगा।पर जब व्यवस्था और शैक्षणिक वातावरण की बात आती है तो हम देखते हैं कि समूचे देश में शासकीय विद्यालयों की स्थिति अच्छी नहीं है।सभी अभिभावकों का मानसिक सेट अप कॉन्वेंट स्कूलों की तरफ झुका हुआ है और लोग अपने बच्चों का प्रवेश उन्हीं  स्कूलों में कराते हैं।बहुत कम लोग सरकारी विद्यालयों में अपने बच्चों का प्रवेश कराते हैं।ऐसा क्यों है।

        यदि हम समूचे देश में देखें तो एक ऐसे वातावरण का निर्माण हो रहा है जहाँ जनता के मन में एक प्रत्यक्षीकरण नौकरी और रोजगार को लेकर है।अब लोग खेती बारी को निम्न स्तर का कार्य मानने लगे हैं।निम्न स्तर का इसलिए कि जो लोग खेती किसानी में लगे हैं उन्हें लोग बेकार या असफल व्यक्ति मानते है।जब किसी को कोई नौकरी नहीं मिलती तो वह बेरोजगार की कैटेगरी में माना जाता है। और खेती बारी में लग जाता है। नौकरी मिलेगी कैसे? नौकरी मिलती है अंग्रेजी पढ़ने से। नौकरी मिलती है इंजीनियरिंग पढ़ने से,नौकरी मिलती है कॉन्वेंट में पढ़ने से।इस मनोवृत्ति से अभिभावक और छात्र दोनों ग्रसित हैं और इसका रास्ता उन्हीं कॉन्वेंट स्कूलों से होकर जाता है।इसलिए लोग अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में प्रवेश कम कराते हैं।भारत वर्ष के विद्यार्थियों में एक मनोवृत्ति और पनप रही है कि शैक्षणिक माहौल भारत का उस तरह का नहीं रह गया है कि यहां आगे की पढ़ाई की जा सके।आगे और विदेशों में पढ़ने के लिए इंग्लिश,जर्मन,फ्रेंच इत्यादि भाषाओं का ज्ञान होना जरूरी है और ये भाषाएं कॉन्वेंट में ही सीखी जा सकती हैं।

       यह पक्ष अत्यंत विचारणीय है। भारतीय ज्ञान का डंका पूरे विश्व में बजता था। सोच में अंतर और परिवर्तन होने के कारण हमारा ध्यान सिर्फ़ नौकरी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के निर्वहन तक आकर सिमट गया है और हम किसी भी तरह से कमाये जाने वाले स्रोतों पर ध्यान डिगा बैठे हैं।हमारी सोच भौतिक जरूरतों को पूरा करने तक सीमित हो गई है और हम उस शिक्षा को भूलते जा रहे हैं जो हमें मानव होने का अहसास कराती है। प्राथमिक शिक्षा में सुधार करने की बड़ी जिम्मेदारी सरकारों पर है। हिंदी भाषा गड्डमड्ड हो गई न तो वह देश की भाषा बन पा रही है न ही नौकरी के लिए अनुकूल। ऐसी स्थिति प्राथमिक शिक्षा की दशा पर विचार मांगती है। शिक्षा को निजी हाथों में सौंपना न हितकर है न ही राष्ट्र के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, और सर्वांगपूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए अनुकूल है।

यदि शिक्षा भौतिकवाद का समर्थन करती प्रतीत हुई तो समझिए कि राष्ट्र उन्नति के समक्ष वैचारिक खतरे हैं।प्राथमिक शिक्षा को सशक्त करने की जरूरत है और वह मजबूती तब आएगी जब वहां पर छात्र रुचि को ध्यान देकर विभिन्न स्किल्स की तरफ उन्हें मोड़ा जाय और वहां व्यवस्थित प्रशिक्षण दिया जाय। प्रशिक्षण के लिए वर्कशॉप और प्रशिक्षित प्रशिक्षकों की व्यवस्था करनी होगी साथ में वहां दिनचर्या ऐसी होनी चाहिए जहाँ मूल्यपरक ज्ञान भी दिया जाय जो प्रार्थना, संगोष्ठी, पूजा, पाठ, सहायतापरक व्यवहार जैसी गतिविधियों को सतत चलाया जाय। इससे उनके अंदर विशिष्ट प्रकार के स्किल सीखने की अभिलाषा जगेगी जिसे वे अगली कक्षाओं में भी इसे सीखने का प्रयास करेंगे। पाठ्यवस्तु ऐसा हो जिसमें नैतिकता,सामूहिक उत्तरदायित्व, देशप्रेम, गीता, रामायण, गणित, वैज्ञानिक आविष्कारों को सरल भाषा में सीखने और पढ़ने का अवसर मिले। इस तरह एक संतुलित सृजनात्मक अध्ययन का वातावरण निर्मित होगा और शिक्षकों को अपने ज्ञान का उपयोग करने का अवसर मिलेगा। इससे प्राथमिक शिक्षा की दशा और दिशा दोनों ही बदलेगी तथा राष्ट्र अपने लक्ष्य को भी पा सकेगा।पाठ्यवस्तु के आधार पर समूचे राष्ट्र के लिये एकरूपता आएगी और कॉन्वेंट में दौड़ लगाने की जरूरत नहीं होगी।

    एन सी टी ई ने प्राथमिक शिक्षा के लिए जिस पाठ्यवस्तु की रचना कराई है वह प्रतियोगी परीक्षाओं को ध्यान में रखकर बनवायी है। प्राथमिक शिक्षा को इससे बाहर आने को सोचना चाहिए जो बच्चों को स्किल्ड बनाये साथ ही उनमें समग्र व्यक्तित्व का विकास कर सके। जब तक उनके अंदर मूल्यों का विकास नहीं होगा, शिक्षा का अर्थ बेमानी होगा।
(शोध विवेचक, चित्रकूट)

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