डिजिटल प्रगति :चमक और छाया
इलमा अज़ीम
पिछले एक दशक में भारत ने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में ऐतिहासिक छलांग लगाई है। इंटरनेट कनेक्शन 25 करोड़ से बढ़कर करीब 97 करोड़ हो चुके हैं। 5जी नेटवर्क, भारतनेट और सस्ते डेटा ने गांव-गांव तक डिजिटल सेवाएं पहुंचा दी हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था का योगदान राष्ट्रीय आय में 13 प्रतिशत से ज्यादा होने का अनुमान है और लगभग 85 प्रतिशत घरों में कम से कम एक स्मार्टफोन मौजूद है। यह उपलब्धि है लेकिन इसके समानांतर स्क्रीन टाइम भी विस्फोटक रफ्तार से बढ़ा है। करोड़ों युवा दिन का बड़ा हिस्सा मोबाइल पर बिताते हैं-ओटीटी, सोशल मीडिया और गेमिंग के बीच झूलते हुए।
यहीं से सुविधा आदत बनती है और आदत कब लत बन जाती है, पता ही नहीं चलता। इकोनॉमिक सर्वे डिजिटल लत को स्मार्टफोन, इंटरनेट, गेमिंग और सोशल मीडिया से जुड़ा नशे जैसा व्यवहार बताता है जहां व्यक्ति लगातार, अत्यधिक और जुनूनी ढंग से स्क्रीन से जुड़ा रहता है। इसके नतीजे साफ़ दिख रहे हैं: ध्यान भटकना, नींद की कमी, चिड़चिड़ापन, पढ़ाई और काम में गिरावट, सामाजिक अलगाव और भावनात्मक अस्थिरता। सबसे चिंताजनक असर 15 से 24 वर्ष के युवाओं में देखा जा रहा है।
सोशल मीडिया एडिक्शन, गेमिंग डिसऑर्डर, चिंता और अवसाद के मामले तेजी से बढ़े हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही गेमिंग डिसऑर्डर को मानसिक बीमारी के रूप में मान्यता दे चुका है। यह साफ़ संकेत है कि मामला अब व्यक्तिगत आदतों तक सीमित नहीं रहा-यह सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुका है। डिजिटल लत का पहला शिकार शिक्षा व्यवस्था बन रही है। रील संस्कृति और शॉर्ट वीडियो ने युवाओं की गहन अध्ययन क्षमता को खोखला कर दिया है।
लंबे समय तक ध्यान केंद्रित करने की आदत टूट रही है। शिक्षक बताते हैं कि छात्र किताबों से ज़्यादा स्क्रीन पर निर्भर हो गए हैं। असाइनमेंट कॉपी-पेस्ट हो रहे हैं, आलोचनात्मक सोच घट रही है। यह असर केवल परीक्षा परिणामों तक सीमित नहीं रहेगा। अत्यधिक डिजिटल निर्भरता से काम की उत्पादकता घटेगी, स्वास्थ्य खर्च बढ़ेगा और जोखिम भरे ऑनलाइन व्यवहार से आर्थिक नुकसान होगा। सवाल सीधा है-अगर युवा मानसिक रूप से थके और असंतुलित होंगे, तो देश की कार्यक्षमता कैसे बचेगी?





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