करूणा हस्ताक्षर धर्मगुरु पंडित धीरेंद्र शास्त्री
सपना सी.पी. साहू 'स्वप्निल'
भारतीय आध्यात्मिक इतिहास में समय-समय पर ऐसे व्यक्तित्वों का प्राकट्य होता रहा है, जिन्होंने न केवल धर्म की ध्वजा को थामे रखा, बल्कि समाज की कुरीतियों और अभावों के विरुद्ध एक मौन क्रांति का सूत्रपात भी किया। वर्तमान परिदृश्य में बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री एक ऐसे ही प्रखर नाम के रूप में उभरे हैं। वे मात्र कथावाचक या आध्यात्मिक गुरु नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसे आधुनिक युग के ऋषि के रूप में सामने आए हैं, जिनका हृदय दीन-दुखियों की सेवा के लिए धड़कता है। आज के समय में जब धर्म को केवल कर्मकांडों तक सीमित मान लिया गया है, तब धीरेंद्र शास्त्री जी ने नर सेवा ही नारायण सेवा के मंत्र को साक्षात धरातल पर उतारकर दिखाया है।
धीरेंद्र शास्त्री यूं तो अपने बेबाक अंदाज, स्पष्टवादी स्वभाव के कारण विधर्मियों व नास्तिक लोगो के द्वारा पसंद नहीं किए जाते है पर उनके व्यक्तित्व का सबसे उज्ज्वल पक्ष उनका सेवाभावी स्वभाव है। उनके द्वारा लगातार 7वें वर्ष सामूहिक कन्या विवाह समारोह आयोजित किया गया, जिसमें उन्होंने इस बार महाशिवरात्रि पर 305 निर्धन और अनाथ जोड़ो का विवाह करवाया। वह आज पूरे देश में चर्चा का विषय हैं। हाल ही में उन्होंने जिस विशाल स्तर ऐसी कन्याओं के हाथ पीले किए हैं, वह उनकी करुणा का ही प्रमाण है। अब तक वे सैकड़ों जोड़ों का विवाह संपन्न करा चुके हैं और आगे भी लक्ष्य हजारों का है। इन विवाहों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां जात-पात और ऊंच-नीच का कोई स्थान नहीं है। वे समाज के अंतिम पायदान पर खड़े उस पिता के आंसू पोंछने का कार्य करते हैं, जो अपनी बेटी की शादी के खर्च के बोझ तले दबा होता है। इन कन्याओं को केवल विदा ही नहीं किया जाता, बल्कि उन्हें गृहस्थी का संपूर्ण सामान उपहार स्वरूप दिया जाता है ताकि वे एक सम्मानजनक जीवन में प्रवेश कर सकें। यह कार्य किसी चमत्कार से कम नहीं है कि एक मात्र 29 वर्षीय युवा, अविवाहित संत इतनी निर्धन बेटियों के धर्मपिता बनकर, बिना किसी सरकारी सहायता के, केवल भक्तों के सहयोग से समाज के कल्याण कर रहे है।
दुर्भाग्यवश, आज के दौर में जब कोई व्यक्ति धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए अडिग खड़ा होता है, तो वह स्वतः ही आलोचनाओं का शिकार होने लगता है। धीरेंद्र शास्त्री जी के साथ भी यही हो रहा है। उनके बढ़ते प्रभाव और सनातन धर्म के प्रति उनकी प्रखरता से घबराकर एक वर्ग उन्हें पाखंडी सिद्ध करने की कोशिशों में जुटा रहता है। किसी भी धर्मगुरु को बदनाम करना और उनकी आस्था पर प्रहार करना आज एक फैशनपरस्ती हो गई है। जबकि वास्तविकता यह है कि वे केवल अपनी सनातन परंपराओं का निर्वहन कर रहे हैं। यदि कोई व्यक्ति अपनी अंतर्दृष्टि से किसी की पीड़ा को समझकर उसे ढांढस बंधाता है और बदले में एक रुपया भी नहीं लेता, तो उसे पाखंड की श्रेणी में रखना न्यायसंगत नहीं है। उनका दिव्य दरबार वास्तव में उन निराश लोगों के लिए एक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक उपचार केंद्र की तरह है, जिन्हें कहीं और सहारा नहीं मिलता।
सोशल मीडिया और मीडिया में हिंदू राष्ट्र की उनकी मांग को भी अक्सर गलत चश्मे से दिखाया जाता है। जबकि धीरेन्द्र शास्त्री के पूरे प्रवचन को सुनो तो जब हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं, तो उनका उद्देश्य किसी का अहित करना नहीं, बल्कि हिंदू समाज के हितों की रक्षा करना और सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ करना होता है। वे जात-पात की विदाई की बात करते है। वे एक ऐसे भारत की कल्पना करते हैं जहां रामराज्य जैसी व्यवस्था हो, जहां कोई भेदभाव न हो और जहां हमारी बेटियां सुरक्षित हों। उनके विचारों में राष्ट्रवाद और अध्यात्म का अद्भुत समन्वय होता है। वे जानते हैं कि जब तक हिंदू समाज संगठित नहीं होगा, तब तक राष्ट्र की उन्नति संभव नहीं है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि सनातन परंपरा में धीरेंद्र शास्त्री अकेले ऐसे संत नहीं हैं जो समाज सेवा कर रहे हैं। भारत की धरती संतों की सेवा से सिंचित है। चाहे वे माता अमृतानंदमयी (शिक्षा और स्वास्थ्य), बाबा रामदेव (योग और आयुर्वेद), श्री श्री रवि शंकर (मानसिक स्वास्थ्य और शांति), सद्गुरु जग्गी वासुदेव (पर्यावरण और शिक्षा), अनिरूद्धाचार्य जी (वृद्ध माताओं की सेवा), देवकीनंदन ठाकुर जैसे प्रसिद्ध कथावाचक जो गौ-शालाएं, अस्पताल और निशुल्क भोजन, शिक्षालय की व्यवस्था करते हैं। लेकिन धीरेंद्र शास्त्री की मुखरता और निडरता उन्हें भीड़ से अलग खड़ा करती है। वे सत्य बोलने से नहीं हिचकिचाते, भले ही इसके लिए उन्हें कितनी भी आलोचना झेलनी पड़े।
पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के कार्यों का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो स्पष्ट होता है कि वे समाज के लिए एक वरदान साबित हो रहे हैं। बुंदेलखंड जैसे सूखे और अभावग्रस्त क्षेत्र में कैंसर अस्पताल बनाने का संकल्प लेना, लाखों लोगों को निशुल्क भोजन (अन्नपूर्णा रसोई) उपलब्ध कराना और बिना किसी भेदभाव के समाज को जोड़ना उनके महान चरित्र को दर्शाता है। आलोचना करने वाले आते-जाते रहेंगे, लेकिन इतिहास उन्हीं का स्मरण रखेगा जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और करुणा से समाज की सेवा की। धीरेंद्र शास्त्री आज सनातन धर्म के उस प्रकाश स्तंभ की तरह हैं, जो न केवल धर्म की रक्षा कर रहे हैं बल्कि मानवता की सेवा का एक नया अध्याय भी लिख रहे हैं। वे वास्तविक प्रशंसा के पात्र है।
स्वरचित, मौलिक व इंदौर (म.प्र.)



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