प्रयागराज में फिर गुलजार हुई तंबुओं की नगरी
कल्पवासियों ने डाला डेरा, आस्था का सैलाबप्रयागराज (एजेंसी)।प्रयागराज में संगम की रेती पर शनिवार को पौष पूर्णिमा के पहले स्नान पर्व के साथ ही माघ मेला ही नहीं कल्पवास भी शुरू हो गया। ऐसी मान्यता है कि माघ मास में सभी देवी-देवता प्रयागराज में ही वास करते हैं, इसलिए यहां पौष पूर्णिमा से कल्पवास की शुरुआत होती है। प्रयागराज में कल्पवास करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
शुक्रवार देर शाम तक श्रद्धालुओं का आगमन जारी रहा। कल्पवासियों ने अपने-अपने शिविरों में पहुंचकर आवश्यक सामान व्यवस्थित किया। संग लाए तुलसी के पौधों को कुटिया के बाहर रोपा गया, जबकि ठाकुर जी, पूजा सामग्री, दान की वस्तुएं, राशन और वस्त्र शिविरों के भीतर रखे गए। ई-रिक्शा, कार, पिकअप और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के माध्यम से पुआल, बिस्तर, राशन और जलावन लकड़ी लाते कल्पवासी पूरे दिन नजर आए।
संगम की रेती पर एक बार फिर आस्था ने डेरा डाल दिया है। शनिवार से शुरू हो रहे कल्पवास के लिए लाखों श्रद्धालु संगम तट पर पहुंच चुके हैं। दूर-दराज के क्षेत्रों से आए कल्पवासी व्रत-तप, साधना और संयम का संकल्प लेकर तंबुओं की नगरी में बस गए हैं। पूरे क्षेत्र में जप, तप और पूजा-अनुष्ठान की तैयारी हो रही है। संगम की रेती पर बने तंबुओं में गृहस्थ और साधु-संत कल्पवास करते हैं। कल्पवास में लोगों की दिनचर्या नियमित और संयमित होती है।
अखिल भारतीय दंडी संन्यासी परिषद के संरक्षक स्वामी महेशाश्रम महाराज के मुताबिक पौष पूर्णिमा पर जो श्रद्धालु कल्पवास के लिए आते हैं, उन्हें सबसे पहले संगम तट पहुंचने पर गणेश पूजन करना चाहिए। इसके बाद गंगा पूजन और रेत से पिंडी बनाकर सभी देवी-देवताओं का पूजन करना चाहिए। इसके बाद श्रद्धालु अपने शिविर में पहुंचते हैं। जहां शिविर के बाहर तुलसी और कदली का पौधा रोपने का विधान है।
स्वामी बताते है कि प्रयाग, माघ और कल्पवास तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं। इसका पौराणिक और शास्त्र वर्णित है कि श्रद्धालु पौष पूर्णिमा पर गंगा स्नान कर कल्पवास का संकल्प लेकर एक माह का कठिन तप और व्रत की शुरुआत करते हैं। इस दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।
तीन पहर गंगा स्नान और भूमि पर शयन करते हैं। एक पहर गुरु को भोजन कराने के बाद भोजन ग्रहण करते हैं। अपनी कुटिया में देवी-देवताओं की पूजा अर्चना के साथ ही रामायण और गीता का पाठ करते हैं। संत महात्माओं की कथाओं और प्रवचन का श्रवण करते हैं।
इस तरह से माघी पूर्णिमा तक कल्पवास का संकल्प चलता रहता है। कल्पवास पूरा होने पर श्रद्धालु भगवान सत्यनारायण की कथा का श्रवण कर आध्यात्मिक ऊर्जा बटोर कर अपने घर को लौटते हैं। वहीं, माघी पूर्णिमा के बाद भी कई साधु-संत और कल्पवासी मेले में बने रहते हैं। बताते है कि वे त्रिजटा स्नान के बाद अपने आश्रम व घरों के लिए वापसी करते हैं।


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