दूषित पानी और विकास
 
सपना सीपी साहू 

दूषित जल से इंदौर में हुई मौतों ने विकास की पोल खोल कर रख दी है। भारत में हर दिन बड़ी संख्या में लोगों को दूषित पानी पीना पड़ता है। कम्पोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स की रिपोर्ट के अनुसार भारत में दूषित यानी गंदा पानी पीने से हर साल दो लाख लोगों की मौत हो जाती है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 2030 तक करीब 600 मिलियन लोगों को पानी की कमी से जूझना पड़ सकता है, जो देश की कुल आबादी का 40 फीसदी है। दूषित पानी की समस्या से सबसे ज्यादा दिल्ली और एनसीआर प्रभावित है। 
यहां की आबादी बढऩे के साथ साफ पानी की मांग बढ़ गई है, लेकिन गंदे पानी की आपूर्ति कई लोगों की सेहत को खराब कर रही है। भारत में विश्व की कुल आबादी का लगभग 18 प्रतिशत हिस्सा निवास करता है, जबकि देश में पीने योग्य जल संसाधनों का मात्र 4 प्रतिशत भाग ही उपलब्ध है। 


देश में अत्यधिक जल दोहन तथा अकुशल प्रबंधन के कारण भू-जल स्तर में निरंतर गिरावट आ रही है। इसके परिणामस्वरूप आने वाले समय में देश को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। देश के कई राज्य इस समय पानी की भारी किल्लत से जूझ रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और तमिलनाडु देश के ऐसे टॉप तीन राज्य हैं जहां के अधिकतर जिलों में पानी का संकट छाया हुआ है। 


मौजूद आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश के 38 जिलों के लोग पानी की किल्लत का सामना कर रहे हैं। इनमें से कई जिले ऐसे हैं, जिन्हें अति-दोहित, गंभीर और अर्ध गंभीर श्रेणी में रखा गया। इसके बाद राजस्थान में 29 और तमिलनाडु में 22 जिले हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा मूल्यांकित भारत के गतिशील भूजल संसाधनों का राष्ट्रीय संकलन 2024 की रिपोर्ट के अनुसार देश भर के 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 102 जिलों को अति-दोहित, 22 जिलों को गंभीर और 69 जिलों को अर्ध गंभीर श्रेणी में रखा गया है। 

हरियाणा जैसे अन्य राज्यों में 16 अति दोहित जिले हैं। पंजाब में 19 अति दोहित और 1 गंभीर जिला है। नीति आयोग के अनुसार, वर्तमान में स्वच्छ जल की अपर्याप्त पहुंच के कारण लगभग 60 करोड़ भारतीय गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं तथा इसके कारण प्रतिवर्ष लगभग 2 लाख लोगों की मृत्यु होती है। वर्ष 2030 तक देश में जल की मांग, आपूर्ति की दोगुनी होने की संभावना है। इससे देश में करोड़ों लोगों को जल के गंभीर संकट का सामना करना पड़ेगा तथा देश के सकल घरेलु उत्पाद में 6 प्रतिशत की हानि होने की संभावना है। 

बढ़ती जनसंख्या एवं नगरीकरण देश में बढ़ते जल संकट का एक प्रमुख कारण है। वर्ष 2001 में प्रतिव्यक्ति जल की उपलब्धता 1816 घन मीटर थी जो कि वर्ष 2011 में घटकर 1545 घन मीटर हो गई और वर्ष 2031 तक इसके घटकर 1367 घन मीटर होने की संभावना है। जल-गहन फसलों की कृषि देश की कुल कृषि योग्य भूमि के लगभग 54 प्रतिशत भाग पर जल गहन फसलों जैसे, चावल, गेहूं, गन्ना, कपास इत्यादि की कृषि की जाती है।


 भारत में सिंचाई के लिए भूजल का 65 फीसदी और पीने के पानी के लिए 85 फीसदी हिस्सा है। इस पर अत्यधिक निर्भरता के कारण भूजल स्तर में भारी गिरावट आई है, खासकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और तमिलनाडु जैसे राज्यों में। सीमित जल संसाधनों के आवंटन को लेकर संघर्षों को भी जन्म देता है। जनसंख्या वृद्धि से पानी के लिए प्रतिस्पर्धा तेज हो जाती है।
अंततः अब नहीं संभले तो देर हो जाएगी। हमें यह समझना होगा कि कंक्रीट के ऊंचे ढांचे और चमचमाती सड़कें तब तक विकास नहीं कहला सकता, जब तक कि एक नागरिक को प्यास बुझाने के लिए ज़हरीला पानी पीना पड़े। दूषित जल से होती मौतें प्रशासन की विफलता तो हैं ही, साथ ही यह हमारे प्राकृतिक संसाधनों के प्रति हमारी उदासीनता का भी प्रमाण हैं। यदि हम आज भी जल प्रबंधन और संरक्षण के प्रति गंभीर नहीं हुए, तो 2030 के डरावने आंकड़े केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि एक बड़ी मानवीय त्रासदी के रूप में हमारे सामने होंगे।
​समय की पुकार है कि हमें समाधान की ओर कदम बढ़ाने पड़ेगे। यह संकट गहरा है, लेकिन समाधान अभी भी हमारे हाथों में है। इसके लिए सामूहिक प्रयास अनिवार्य हैं:-
​बूंद-बूंद की कीमत समझें - घरों में पानी की बर्बादी रोकें और रेन वॉटर हार्वेस्टिंग (वर्षा जल संचयन) को केवल सरकारी नियम नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा बनाएं।
​प्रदूषण पर प्रहार - नदियों और जल स्रोतों में कचरा और रसायन बहाना बंद करना होगा। जल स्रोतों की स्वच्छता ही हमारी संजीवनी है।
​जागरूकता ही बचाव है - दूषित पानी के खतरों के प्रति स्वयं जागरूक रहें और दूसरों को भी प्रेरित करें। पानी उबालकर पीना या फिल्टर का सही रखरखाव करना छोटी लेकिन जीवन रक्षक आदतें हैं।
​प्रशासन की जवाबदेही - एक सजग नागरिक के नाते हमें जल वितरण प्रणाली की पारदर्शिता और शुद्धता के लिए प्रशासन से निरंतर सवाल पूछने होंगे।
​सदैव स्मरण रहे, जल ही जीवन है, और इस जीवन को सुरक्षित रखना हम सबकी साझा जिम्मेदारी है। यदि आज हम पानी नहीं बचाएंगे, तो कल पानी हमें बचाने के लिए नहीं बचेगा।
  स्वतंत्र पत्रकार ,इंदौर 



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