- अनुज आचार्य
भारत में आजादी के समय कुल जनसंख्या 33 करोड़ थी जो 2011 की जनगणना के मुताबिक बढक़र 125 करोड़ पहुंच गई थी। कोरोना महामारी के चलते 2021 की जनगणना का कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया था। डिजिटल पॉपुलेशन क्लॉक के अनुसार 05 जुलाई 2024 को भारत की जनसंख्या 1452962421 थी, जिसमें 750202835 पुरुष आबादी (51.6 फीसदी), महिला जनसंख्या 702759539 करोड़ (48.4 प्रतिशत) थी और विश्व की कुल जनसंख्या 8119703999 थी। इंडिया स्टेट डॉट कॉम के अनुमान के अनुसार 2030 तक भारत की कुल जनसंख्या 153 करोड़ और 2050 तक 168 करोड़ तक पहुंच जाएगी। विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आबादी और दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश चीन ने लंबे समय तक एक बच्चा पैदा करने की नीति को सख्ती से लागू किया हुआ था। लगभग 143 करोड़ की आबादी वाले देश चीन में अब वहां की कम्युनिस्ट सरकार ने 3 बच्चों को अपनाने की नीति की घोषणा की है।
चीन जहां अपने यहां बढ़ती बूढ़ी आबादी और कम होती युवा श्रम शक्ति से परेशान है, तो वहीं भारत की 65 फीसदी युवा आबादी जहां भारत का संबल है, तो वहीं देश में बढ़ती बेरोजगारी जैसी बड़ी चुनौती का पर्याय भी है। भारत की बढ़ती जनसंख्या का असर वैश्विक भूख सूचकांक-2023 (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) की रिपोर्ट में भी देखा जा सकता है, जिसमें 125 देशों की सूची में भारत 111वें स्थान पर है और भूख की ‘गंभीर’ श्रेणी में है। इस इंडेक्स में भारत के पड़ोसी देशों- पाकिस्तान (102वें), बांग्लादेश (81वें), नेपाल (69वें) और श्रीलंका (60वें) ने भारत से बेहतर स्थान हासिल किया है। विशेषज्ञों ने इसके लिए खराब कार्यान्वयन प्रक्रियाओं, प्रभावी निगरानी की कमी, कुपोषण से निपटने का उदासीन दृष्टिकोण और बड़े राज्यों के खराब प्रदर्शन को दोषी ठहराया है। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार भारत की 14 फीसदी आबादी कुपोषण की शिकार है।
वैश्विक भूख सूचकांक में देशों को चार प्रमुख संकेतकों के आधार पर रैंकिंग दी जाती है- अल्पपोषण, बाल मृत्यु, पांच साल तक के कमजोर बच्चे और बच्चों का अवरुद्ध शारीरिक विकास। बढ़ती आबादी के पीछे अशिक्षा, अंधविश्वास, परिवार नियोजन के तौर-तरीकों में जागरूकता का अभाव और स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही जैसे बुनियादी कारण हैं। जनसंख्या वृद्धि के कारण नई पीढ़ी को भविष्य के लिए बुनियादी जरूरतों और सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़ेगा।
आज भी भारतीयों को बेरोजगारी, स्वास्थ्य संकट, भुखमरी, चिकित्सा सुविधाओं, कुपोषण, स्वच्छ पेयजल की कमी, बिजली-पानी के संकट और गरीबी से बुरी तरह से जूझना पड़ रहा है। इसके अलावा ग्रामीण आवास की समस्या, गंदा पानी और कूड़ा कचरा जैसी समस्याएं अलग से मुंह बाए खड़ी हैं। यदि समय रहते सरकारों ने आने वाली पीढिय़ों को सुंदर सुखी जीवन देने के लिए अभी से प्रयास शुरू नहीं किए तो भविष्य में भावी पीढिय़ों के समक्ष आपसी संघर्ष की परिस्थितियां निर्मित होना तय है। इसके साथ ही जनसंख्या नियंत्रण के अभाव में देश की आर्थिक स्थिति बिगडऩे से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। जून 2024 में बेरोजगारी दर बढक़र आठ महीने के उच्च स्तर 9.2 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो पिछले महीने 7 प्रतिशत थी। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों के अनुसार जून 2023 में यह दर 8.5 प्रतिशत थी। भारत में 70 के दशक में परिवार नियोजन कार्यक्रम चलाया गया था।
उस समय भी महिलाओं की नसबंदी पर ही ज्यादा ध्यान केंद्रित किया गया था। आपातकाल के दौरान व्यापक पुरुष नसबंदी अभियान चलाया गया था जिसमें एक साल के अंदर साठ लाख से ज्यादा लोगों की नसबंदी कर दी गई थी जिसका भारी विरोध भी हुआ था। यह वक्त का तकाजा है कि केंद्र एवं राज्य सरकारें जनसंख्या वृद्धि से पैदा हो रही चुनौतियों से निपटने के लिए एक सर्व स्वीकार्य कार्यक्रम सामने लेकर आएं ताकि भारतीय लोग परिवार नियोजन को स्वेच्छा से अपनाकर देश को आने वाली पीढिय़ों के लिए रहने लायक बनाने की दिशा में अपना योगदान दे सकें। सही तरीके से गर्भनिरोधक उपायों, गर्भपात, बन्ध्यीकरण, एकल बच्चा पैदा करने की नीति और परिवार नियोजन आदि उपायों से ही जनसंख्या वृद्धि को रोका जा सकता है। हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा एकल और दो बेटियों वाले सरकारी कर्मचारियों को प्रोत्साहन स्वरूप विशेष आर्थिक राशि प्रदान की जा रही है। हिमाचल प्रदेश में इंदिरा गांधी बालिका सुरक्षा योजना के तहत अब एक बेटी के बाद परिवार नियोजन अपनाने वाले परिवार को दो लाख रुपए मिलेंगे।
वहीं दो बेटियों के बाद परिवार नियोजन अपनाने पर अब एक लाख रुपए मिलेंगे। इस वर्ष विश्व जनसंख्या दिवस का थीम है, ‘भविष्य की पीढिय़ों को सशक्त बनाना : सतत विकास और जनसंख्या रुझान।’ जनसंख्या दिवस हमें याद दिलाता है कि समस्याओं को समझने, समाधान तैयार करने और प्रगति को आगे बढ़ाने के लिए डेटा संग्रह में निवेश करना महत्वपूर्ण है। जनसंख्या नियंत्रण कानून को लेकर पिछले कई दशकों से बहस चल रही है। 1970 के दशक से हम सभी ‘हम दो हमारे दो’ का नारा सुनते आए हैं। हालांकि कभी भी किसी सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण के कानून को लागू करने की हिम्मत नहीं दिखाई। जनसंख्या नियंत्रण पर कानून बनाने या इसका जब भी जिक्र होता है, तब हिंदू-मुस्लिम बहस छिड़ जाती है। कुछ मुस्लिम नेताओं का कहना है कि जनसंख्या नियंत्रण कानून मुस्लिम विरोधी है। लेकिन यह समय की मांग है कि भारत में बढ़ती आबादी से उत्पन्न हो रही चुनौतियों से निपटने के लिए केंद्र सरकार को जनसंख्या नियंत्रण कानून को अनिवार्य रूप से शीघ्र सिरे चढ़ाना होगा।



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