एजेंसियों की विश्वसनीयता!
 इलमा अजीम 
देश की शीर्ष अदालत गाहे-बगाहे राजनीतिक हथियार बनीं एजेंसियों की कारगुजरियों पर सवाल उठाती रही हैं। कभी कोर्ट ने एजेंसी को पिंजरे का तोता कहा तो कभी इन एजेंसियों में नियमों से इतर शीर्ष अधिकारियों के लगातार बढ़ते कार्यकाल को लेकर भी सवाल उठाए। पिछले कुछ महीनों में ऐसा विवाद शीर्ष अदालत व सरकार के बीच खासा चर्चित रहा। वीरवार को शीर्ष अदालत में आप के पूर्व मंत्री मनीष सिसोदिया की शराब नीति में कथित भ्रष्टाचार विवाद प्रकरण में हुई गिरफ्तारी से जुड़े सवालों पर ईडी से तीखे सवाल किये गये। लगाये गये आरोपों की तार्किकता पर सवाल उठे कि जब मनीष सिसोदिया की मामले में सीधी भूमिका नहीं है तो उन्हें आरोपी क्यों बनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी का केस ठोस सबूतों के आधार पर होना चाहिए अन्यथा जिरह के दौरान केस दो मिनट में गिर जाएगा। कोर्ट का कहना था कि यदि मनीष सिसोदिया की भूमिका मनी ट्रेल में नहीं है तो मनी लॉन्ड्रिंग में सिसोदिया आरोपियों में क्यों शामिल हैं। कोर्ट का कहना था कि मनी लॉन्ड्रिंग अलग कानून है। यह भी कि ईडी साबित करे कि सिसोदिया केस प्रापर्टी में शामिल रहे हैं। बहरहाल, अब कोर्ट उनकी जमानत याचिका पर बारह अक्तूबर को सुनवाई करेगी। इस बीच कोर्ट ने सरकारी गवाहों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाये। कोर्ट का कहना था कि केस ठोस सबूतों की बुनियाद पर तैयार होना चाहिए। अनुमान के आधार पर केस तैयार नहीं किये जा सकते। कोर्ट का कहना था कि राजनीतिक कार्यकारी के निर्देशों पर नौकरशाहों को विवेकशील ढंग से विचार करना चाहिए। कोर्ट ने पूछा कि शराब नीति में कथित घोटाले मामले में सीबीआई चार्जशीट में अनुमानित राशि और ईडी की रिपोर्ट में उल्लेखित राशि में अंतर क्यों है। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि नई शराब नीति से यदि किसी राजनीतिक दल विशेष को लाभ पहुंचा है तो उस पार्टी को इस केस में क्यों नहीं शामिल किया गया? वहीं दूसरी ओर आप सांसद संजय सिंह की कोर्ट में हुई पेशी के दौरान अदालत ने ईडी की कार्यशैली को लेकर कई तीखे सवाल पूछे। साथ ही यह भी पूछा कि उनकी कस्टडी क्यों जरूरी है। जिसके बाबत ईडी का तर्क था कि सांसद के घर से जो सबूत मिले हैं, उनसे जुड़े सवालों को लेकर पूछताछ जरूरी है। बहरहाल, ऐसे मामलों में एजेंसियों को तार्किक आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए।

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