अनेकता में एकता के ताने-बाने पर एक नजर
- राजेंद्र बज
अनेकता में एकता का ताना-बाना भारतीयता के भाव से ओतप्रोत रहा है। अलग अलग भाषा, संस्कृति , रीतिरिवाज और परंपराओं के बावजूद राष्ट्रीय चरित्र को अपने स्वाभाविक आचरण में आत्मसात करने के प्रति आम नागरिकों में समर्पण के भाव सदैव विद्यमान रहे हैं। राजनीतिक कारणों से क्षेत्र तथा भाषा के आधार पर वर्ग भेद करते हुए क्षेत्रीय क्षत्रपों द्वारा क्षेत्रवाद को बढ़ावा जरूर दिया गया। लेकिन आम नागरिकों की राष्ट्रवादी भावनाएं मुख्यधारा के विपरीत नहीं जा सकी।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में राष्ट्रवादी नेतृत्व का व्यापक जनहित के प्रति प्रतिबद्धता के साथ-साथ भारतीयता का गुणगान एक नई आशा का संचार करता है। लोकल को ग्लोबल बनाने की जिद और जुनून भारत को विश्व की महाशक्ति के रूप में उभरने का मार्ग प्रशस्त करता है। इस दिशा में समस्त राजनीतिक दलों को केंद्रीय नेतृत्व का सहयोग करना चाहिए।
बावजूद इसके वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों के मद्देनजर हमें और अधिक चौकन्ना रहने की नितांत आवश्यकता है।देश की एकता और अखंडता को तार-तार करने की कोशिशें राजनीतिक संरक्षण पाती जा रही है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अलगाववाद को प्रोत्साहित किया जा रहा है। राजनीतिक दलों द्वारा अपने अपने प्रतिद्वंदी राजनीतिक दलों के वर्चस्व को कम करने हेतु राष्ट्रीय हितों को तिलांजलि देने का अनुक्रम जारी है। राष्ट्र के प्रति निष्ठा और समर्पण के भाव बौद्धिक जुगाली की विषयवस्तु बनते जा रहे हैं।
अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग विचारधारा के राजनीतिक दलों की सत्ता अपनी अपनी नीतियों को क्रियान्वित कर रही है। राजनीतिक स्वार्थसिद्धि की ऐसी अंधी होड़ राष्ट्रवाद की भावनाओं को आहत करती जा रही है। ऐसे में राष्ट्रवादी सोच को प्रोत्साहित करने की रीति-नीति अपनाने की सख्त आवश्यकता है। ऐसा होने पर ही सशक्त राष्ट्र की परिकल्पना को सार्थक स्वरूप दिया जा सकेगा।
राजनीति में नैतिक मूल्यों का विलोपन हो रहा है। व्यक्तिकेंद्रित राजनीतिक दल विभिन्न राज्यों में सशक्त बनते जा रहे हैं। प्रकारांतर से अनेक राज्यों में लोकतंत्र के नाम पर एकतांत्रिक व्यवस्था भी मूर्त रूप ले रही है। केंद्रीय नेतृत्व की खिलाफत करते हुए क्षेत्रीय मुद्दों को उछालकर आम नागरिकों की भावनाओं को भड़काने का दौर भी जारी है। ऐसे में कट्टर प्रांतवादी नजरिया कालांतर में राष्ट्रीय नजरिए के विपरीत न जा सके, इस संदर्भ में हमें सचेत रहने की आवश्यकता है।
केंद्र व राज्यों में अलग अलग दल की सरकार होने पर केंद्र तथा राज्य के संबंधों में तकरार स्वाभाविक रूप से हो सकती है। लेकिन ऐसी तकरार अपने अहम की तुष्टि हेतु होने लगे तब समस्याएं विकट होती जाती है। दशकों पूर्व केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर व्यापक स्तर पर समीक्षा की गई। लेकिन इस विषयक जो कुछ समस्या है वह मात्र राजनीतिक है।
जहां तक जनमानस का प्रश्न है, आम नागरिक हमारी राष्ट्रीय एकता और अखंडता पर गर्व की अनुभूति ही करता रहा है। अनेकता में एकता का ताना-बाना व्यापक रूप से जन समर्थन प्राप्त है। लेकिन जैसे-जैसे क्षेत्रीय नेतृत्व की राजनीतिक महत्वाकांक्षा बढ़ती रही वैसे वैसे इन संबंधों में दूरियां बनने लगी। वर्तमान व्यवसायिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक रूप से विभिन्न प्रांतवासी परस्पर बेहतर तालमेल रखते हैं। कहीं कोई पूर्वाग्रह या कटुता के भाव नहीं होते। साथ ही एक दूसरे की संस्कृति को आपस में साझा करने की उत्कंठा का परिचय भी मिलता है। परस्पर जिज्ञासु भाव के आकर्षण के चलते अलग अलग तौर-तरीकों को सीखने व समझने का व्यापक अनुभव पाने की भावना भी बलवती होती देखी जाती है। दरअसल जो भी कुछ अवरोध है,वह राजनीतिक स्तर पर है।
धार्मिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक स्तर पर कहीं कोई किसी प्रकार का मतभेद नहीं है और न ही किसी प्रकार की असहमति है। बावजूद इसके जो समस्या है वह शत-प्रतिशत राजनीतिक ही है। लेकिन निरंतर परिवर्तित परिवेश में हम यूं आशान्वित हो सकते हैं कि शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ आम नागरिकों का एक बड़ा वर्ग सुलझी हुई विचारधारा का धनी है।
माना कि इस वर्ग में राजनीतिक चेतना अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है, लेकिन हालात और परिस्थितियों को समझने की गहरी समझ यह वर्ग निश्चित रूप से रखता है। यदि राजनीतिक नेतृत्व ने उक्त संदर्भ में अनर्गल प्रलाप का सिलसिला प्रारंभ किया, तो उसका प्रबल प्रतिकार करने की दिशा में यह वर्ग अग्रसर हो सकता है। यह ठीक है कि राजनीति को लेकर प्रबुद्ध एवं संभ्रांत वर्ग अधिक मुखर नहीं है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वह परिस्थितियों को सर्वथा अनदेखा ही कर रहा है।



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