सत्येंद्र प्रकाश तिवारी
ज्ञानपुर, भदोही।
दीया जलाने का खास महत्व होता है। विशेष अवसरों पर तो दीये जलाये ही जाते हैं, सुबह-शाम भी दीप प्रज्वलन किया जाता है। हर भारतीय घर में दीपावली के कुछ दिन पहले से कुछ दिन बाद तक दीये जलाये जाते हैं। प्रकाश पर्व हो, गुरु पर्व हो या फिर कोई भी ऐसा मौका, हम पूजा-अर्चना करते हैं, दीये जलाते हैं। किसी विशेष अनुष्ठान के मौके पर भी दीया जलाया जाता है। यानी शुभ कार्य एवं पूजा के हर अवसर पर दीये जलाने की परंपरा है। पूजन के वक्त सर्वप्रथम कार्य ही दीया जलाना होता है।
असल में दीप प्रज्वलन अर्थात दीये को जलाने का मतलब है अंधकार को भगाना। अंधकार जो हमें दिख रहा है और अंधकार जो हमें नहीं भी दिख रहा है। मन के अंधेरे को दूर करना। तन के अंधेरे यानी अस्वस्थता को दूर करने का संदेश है दीप प्रज्वलन। दीप जलाकर आपको एक प्रसन्नता होती है। मन को एक खुशी मिलती है। दीये का यह प्रकाश हमें प्रसन्नता दे। अंधकार दूर करे और तन-मन से हम स्वस्थ बने रहें। घर में सब शुभ हो। दीया जलाते वक्त इसीलिए तो इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है-
शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते।। दीपो ज्योति परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दन:। दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते।।
अर्थात जो शुभ करता है, कल्याण करता है, आरोग्य रखता है, हमें धन संपदा देता है और शत्रु बुद्धि का विनाश करता है, ऐसे दीप की रोशनी को मैं प्रणाम करता हूं। जिस कार्य को करने की भावना ही इतनी बलवती हो, उस कार्य के हो जाने का आनंद ही कुछ और है। अर्थात दीपक जलाने की प्रसन्नता ही बहुत कुछ दे जाती है हमारे तन-मन को। जानकार कहते हैं कि दीपक हमारे अन्त:चक्षुओं का प्रतिबिम्ब भी है जो सतत हमारी भौतिकता एवं आध्यात्मिकता के बीच सेतु बनाता है। दीप की लौ सीधे हमारे अंतरआत्मा से जुड़ती है। प्रत्येक शुभकार्य के साथ दीप प्रज्वलन की परंपरा का अर्थ है कि प्रकाशमान हमारी यह गति बनी रहे और भविष्य के कार्य अच्छी तरह से पूर्ण हो जायें।

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