- सतीश चन्द्र शुक्ल सत्पथी
जौनपुर।
जितने भी प्राणी इस संसार में जन्म लेते हैं उनमें सबसे ज्यादा मनुष्य ही अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए मोह में फंसे होने के कारण वंशवाद और परिवारवाद में उलझा रहता है। पक्षियों में केवल प्रजनन से लेकर परवरिश तक मोह होता है। उसके बाद वह अपने बच्चों को उनके अनुसार मोह माया त्याग कर छोड़ देता है। जब तक वह आत्म रक्षा की दृष्टि से अपना बचाव अपना खान-पान की तलाश कर लेने में सक्षम नहीं हो जाते। ऐसा नहीं है कि वह अपने बच्चों से दुलार प्यार नहीं करते लेकिन उसकी भी एक निश्चित सीमा होती है।
जब तक उसे लगता है की हमारा बच्चा अपने लिए खाना पानी की तलाश और अन्य जीवों से अपना बचाव करने में अब सक्षम हो चुका है उसके पहले तक वह मादा अपने बच्चों को चोंच से दाना पानी खिलाती रहती है। लेकिन मानव स्वभाव सर्वदा इसके विपरीत है विडम्बना यह है कि पक्षियों का न तो कोई स्कूल होता है और न ही कोई शिक्षक फिर भी वह अपने बच्चों व खुद के लिए ऐसे ऐसे घोसले और आशियाने बना लेती हैं, जिससे उनकी बाह्य जीवों से सुरक्षा संरक्षा होती रहती है। जब उन्हें इस बात का ज्ञान हो जाता है कि हमारे बच्चों में अपना भोजन तलाशने और अपनी रक्षा के उपाय का समावेश हो चुका है तब वह अचानक बच्चों से विलग फिर अपनी दुनियां में वापस हो जाती हैं।
मानव जीवन ठीक इसके इतर वंशवाद और परिवार वाद में ताउम्र उलझा रहता है, जिससे निरन्तर यूँ कहिये उम्र भर वह जिम्मेदारी ढोते-ढोते स्वर्ग सिधार जाता है। गुस्सा और नफरत के बीच का अन्तर समझते-समझते वह पूरा जीवन बरबाद कर जाता है। हमें पक्षियों से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।

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