निर्मल जल संग देवनदी शिवशम्भू की कथा सुनाती,
शाश्वत शान्ति हृदय में प्रति पल स्वयं उतरती जाती।

दर्शन करते ही नयनों की ज्योति दीप्त हो जाती,
पावन जल में संस्कृतियों की घुली हुई है माटी।
कल कल करती नाद मनुज के कर्मों की यह थाती,
शाश्वत शान्ति हृदय में प्रति पल स्वयं उतरती जाती।


पीडित क्षुब्ध विकलता जब स्पर्श नीर का करती,
रोम रोम रस से भर जाता व्यथा ताप को हरती,
पंचतत्व से र्निमित काया गंगा का आश्रय पाती,
शाश्वत शान्ति हृदय में प्रति पल स्वयं उतरती जाती।
करुणा, दया, धैर्य, कोमलता का वरदान है देती,
ममता का भंडार लुटाती कभी भी कुछ न लेती।

तन छूती पर मन की कालिमा स्वच्छ है करती जाती,
शाश्वत शान्ति हृदय में प्रति पल स्वयं उतरती जाती।
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- सीमा मिश्रा
बिन्दकी, फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)।

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