सरधना (मेरठ) नगर में चौक बाजार स्थित श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में चल रहे पर्यूषण पर्व के सातवें दिन दिगंबर जैन समाज के अनुयायियों ने उत्तम तप धर्म की आराधना की। नगर के विभिन्न जैन मंदिरों के साथ ही घरों पर श्री जी की पूजा की गई। मुनि श्री महाराज जी ने कहा कि तप का अर्थ इच्छाओं पर नियंत्रण करना है। मुक्ति जब भी मिलेगी, तपस्या से ही मिलेगी। उन्होंने बताया कि रावण ने जितना तप विद्या सिद्धि पाने के लिए किया, यदि उतना ही तप आत्मशुद्धि के लिए करता तो भव से मोक्ष चला जाता। 


उन्होंने कहा कि जिस तरह से स्वर्ण पाषाण में स्वर्ण छिपा होता है, तिल के अंदर तेल व्याप्त होता है, उसी प्रकार देह में आत्मा विद्यमान है। उस आत्मा की अभिव्यक्ति ही परमात्मा की उपलब्धि है और यही धर्म साधना का मूल ध्येय है। स्वर्ण पाषाण को अग्नि में तपाया जाता है, तब उसका शुद्ध स्वरूप निखर उठता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति तप अनुष्ठान करता है, उसकी आत्मा कुंदन बन जाती है। अपने भीतर छिपी शक्ति को पहचान ने की प्रत्येक प्राणी में अपार क्षमता है, उसकी अभिव्यक्ति तपस्या के बल पर होती है। 


उन्होंने कहा कि बुरे कर्मो की निर्जरा (नाश) के लिए की गई क्रिया ही तप है। यानी आत्मा में एकत्र कषाय का विसर्जन करना उत्तम तप है। इस मौके पर जैन समाज के लोगों ने अहंकार को त्यागकर उत्तम क्षमा धर्म का संकल्प लिया। इस अवसर पर नरेश जैन कुणाल जैन आदिश्वर जैन बिट्टू जैन अरिहंत जैन सिद्धार्थ जैन सुनील जैन रजत जैन गौरव जैन दीपक जैन पंकज जैन आदि मुख्य रूप से शामिल रहे।

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