अद्वैत वेदांत के प्रणेता जगतगुरु आद्य शंकराचार्य जब बालक शंकर ही थे, तभी अगस्त्य ऋषि ने उनकी आयु 32 वर्ष होने की भविष्यवाणी कर दी थी। वैसे तो आचार्य शंकर ने पूरे भारत की यात्रा की, परन्तु उनके जीवन का अधिकांश भाग उत्तर भारत में ही व्यतीत हुआ। अपने भौतिक शरीर के अंतिम पड़ाव में आचार्य शंकर उत्तराखंड के प्रसिद्ध तीर्थ केदारनाथ में थे। आचार्य शंकर की आयु 32 वर्ष होने वाली थी। वह केदारनाथ में रहकर अधिकतर समय समाधि में रहने लगे। उन्होंने अपने शरीर पर ध्यान देना बंद कर दिया। उनकी यह स्थिति देखकर शिष्यों की परेशानी बढ़ने लगी लेकिन आचार्य समाधि से बाहर आते ही नहीं थे। एक दिन उन्होंने अपने प्रमुख शिष्यों को बुलाकर कहा-
 ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर:।’
अर्थात‍् ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है तथा जीव ब्रह्म ही है, कोई अन्य नहीं। जीव और ब्रह्म में कोई भेद नहीं। मेरे इस शरीर के समस्त कार्य पूर्ण हो गए हैं। अब स्वरूप में लीन होने का समय आ गया है। यह कहकर आचार्य शंकर निश्चल हो गए।

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