एक राजा ने अपने शौर्य से काफी बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लिया था, लेकिन हमेशा उसे डर सताता रहता था कि कहीं उसके साथी धोखा देकर सारा राजपाट न छीन लें। इस चिंता के कारण राजा अपनी प्रजा से भी कट चुका था। इसी दौरान उसके राज्य में एक यशस्वी फकीर आया। राजा को पता चला तो वह भी फकीर के पास पहुंचा। फकीर के पूछने पर राजा ने अपनी व्यथा कह सुनाई। फकीर ने कहा, ‘राजन, आओ पहले मैं आपको भोजन कराता हूं।’ इसके बाद फकीर ने कुछ लकड़ियां इकट्ठा कर आग जलाई और उससे राजा को खाना बनाकर खिलाया। पर राजा तो अपने सवाल का जवाब पाने को बेचैन था।
उसने फिर फकीर से जवाब देने का निवेदन किया तो फकीर ने आग की जलती लकड़ी अपनी घास-फूस की कुटिया पर फेंक दी। कुटिया धू-धूकर जल रही थी। राजा ने कहा, ‘यह आपने क्या किया?’ फकीर बोला, ‘यही आपके सवाल का जवाब है राजन! इस दुनिया में कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं होता। इसी आग से स्वादिष्ट भोजन बनाकर पेट की भूख शांत की जा सकती है और यही वह आग है, जिससे इन्सान का घर भी जलाया जा सकता है। यह तो आपके ऊपर है कि इससे आप कैसा काम लेते हैं। इसलिए व्यर्थ की चिंता छोड़ अपने सहयोगियों का विश्वास और प्यार जीतिए।’

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