वह प्रखर सूर्य शीतल चन्दा,
टिमटिम  करते अनगिन तारे,
हैं पिंड कई जाने क्या-क्या,
अद्भुत अकल्पनीय और प्यारे,
उन्मुक्त व्योम के तथ्यों को,
बेपर्दा मुझको करना है,
मुझे नीलगगन में उड़ना है।

वह सप्तऋषि मंडल अद्भुत,
आश्चर्यजनक पुच्छल तारा,
जिज्ञासा करते उल्का पिंड,
उन्मुक्त गगन उफ्फ क्या न्यारा,
उस सतरंगी ऋजुरोहित के,
रंगों को मुझको गिनना है,
मुझे नीलगगन में उड़ना है।

वह जो है निर्मल स्वच्छ शून्य,
जहाँ सन-सन बहती शुद्ध पवन,
नहीं नफ़रत जहाँ कोई पलती,
जहाँ मलिन हृदय नहीं कोई जन,
उन्मुक्त जहाँ नभचर रहते,
उन्मुक्त वहीं मुझे रहना है,
मुझे नीलगगन में उड़ना है।

   

                   
- नरेश चन्द्र उनियाल
पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड।


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