सुरक्षा का सवाल: डर महिलाओं का नहीं, व्यवस्था का होना चाहिए

कुछ दिन का आक्रोश नहीं, ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें सड़क, बस और सार्वजनिक जगह पर निकलना महिलाओं के लिए जोखिम न बने

इलमा अज़ीम 

पिछले कुछ समय में महिलाओं और किशोरियों के खिलाफ यौन हिंसा की जिन घटनाओं ने देश को झकझोरा, उन्होंने एक पुराना सवाल फिर सामने ला दिया है—क्या हमारे शहर महिलाओं के लिए वास्तव में सुरक्षित हैं? राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में किशोरियों के साथ सामूहिक दुष्कर्म, हत्या और सार्वजनिक परिवहन में यौन हिंसा की घटनाएं सामने आने के बाद स्वाभाविक रूप से गुस्सा पैदा हुआ। राजनीतिक बयान आए, विरोध हुआ, सोशल मीडिया पर बहस चली और कुछ दिनों तक सुरक्षा व्यवस्था चर्चा के केंद्र में रही। लेकिन असली परीक्षा उस समय होती है, जब सुर्खियां बदल जाती हैं और सड़कों पर जिंदगी फिर सामान्य दिखाई देने लगती है।

निर्भया कांड के बाद देश ने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बड़े बदलावों की उम्मीद की थी। कानून बदले, विशेष अदालतों की बात हुई, हेल्पलाइन शुरू हुईं, सीसीटीवी कैमरे लगे, सार्वजनिक स्थानों की निगरानी बढ़ाने की योजनाएं बनीं और निर्भया फंड के जरिए सुरक्षा परियोजनाओं को आर्थिक सहायता दी गई। 'सेफ सिटी' और 'मिशन शक्ति' जैसी पहल भी इसी सोच का हिस्सा हैं। सवाल इन योजनाओं की संख्या का नहीं, बल्कि उनके जमीन पर असर का है।

कैमरा लगा होना और कैमरे का काम करना अलग बात है

किसी सड़क पर सीसीटीवी कैमरा लगा देना सुरक्षा की गारंटी नहीं है। सवाल यह है कि कैमरा 24 घंटे काम करता है या नहीं? उसकी रिकॉर्डिंग सुरक्षित रहती है या नहीं? फुटेज देखने की जिम्मेदारी किसकी है? संदिग्ध गतिविधि दिखाई देने पर पुलिस कितनी जल्दी प्रतिक्रिया देती है?

इसी तरह सड़क पर रोशनी लगा देना भी पर्याप्त नहीं। अंधेरे कोनों, सुनसान रास्तों, बस स्टॉप, पार्किंग स्थलों, रेलवे स्टेशन और सार्वजनिक परिवहन के आसपास सुरक्षा का नियमित आकलन होना चाहिए। जिस जगह को जोखिम वाला क्षेत्र माना गया है, वहां केवल बोर्ड लगाने के बजाय पुलिस गश्त, निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करनी होगी।

हेल्पलाइन का नंबर नहीं, मदद की गति मायने रखती है

महिला सुरक्षा के लिए कई हेल्पलाइन और आपातकालीन सेवाएं उपलब्ध हैं। लेकिन किसी महिला के लिए संकट की घड़ी में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उसकी सूचना के बाद मदद कितनी जल्दी पहुंचती है।

एक प्रशिक्षित पुलिसकर्मी की कुछ मिनटों में मौजूदगी कई बार बड़ी घटना को रोक सकती है। इसके लिए पुलिसकर्मियों को केवल कानून-व्यवस्था संभालने का प्रशिक्षण नहीं, बल्कि लैंगिक संवेदनशीलता, पीड़ित से संवाद और यौन अपराधों की प्रारंभिक कार्रवाई का भी पर्याप्त प्रशिक्षण मिलना चाहिए।

सुरक्षा व्यवस्था की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितनी योजनाएं बनाई गईं, बल्कि इससे कि संकट की स्थिति में नागरिक को कितनी जल्दी और कितनी प्रभावी मदद मिली।

हर घटना के बाद नई घोषणा नहीं, पहले से तैयारी जरूरी

अक्सर किसी बड़ी घटना के बाद कुछ दिनों के लिए पुलिस गश्त बढ़ा दी जाती है। संवेदनशील स्थानों पर अतिरिक्त बल लगाया जाता है और समीक्षा बैठकें होती हैं। लेकिन स्थायी सुरक्षा व्यवस्था इस तरह नहीं चल सकती।

शहर के हर जिले और थाने के स्तर पर यह पहचानना जरूरी है कि कौन से रास्ते, इलाके और सार्वजनिक परिवहन के साधन महिलाओं के लिए अधिक जोखिम वाले हैं। इन स्थानों का नियमित सेफ्टी ऑडिट होना चाहिए। जहां खामी मिले, उसे दूर करने की समयसीमा तय हो और जिम्मेदार अधिकारी की जवाबदेही भी स्पष्ट हो।

न्याय में देरी भी सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरी है

महिला सुरक्षा केवल पुलिस का विषय नहीं है। अपराध के बाद न्याय की गति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि जांच लंबी चले, आरोपपत्र में देरी हो, गवाहों की सुरक्षा कमजोर हो और मुकदमे वर्षों तक चलते रहें तो पीड़ित परिवार के लिए न्याय की लड़ाई और कठिन हो जाती है।

इसलिए तेज जांच, बेहतर फोरेंसिक व्यवस्था, सक्षम अभियोजन और समयबद्ध सुनवाई—इन सभी को एक साथ मजबूत करना होगा। फास्ट-ट्रैक कोर्ट तभी प्रभावी होंगे, जब उनके पास समय पर और गुणवत्तापूर्ण जांच का रिकॉर्ड पहुंचे।

समाधान महिलाओं की आजादी कम करना नहीं

महिला सुरक्षा पर चर्चा के दौरान एक खतरनाक रास्ता यह है कि सुरक्षा की जिम्मेदारी महिलाओं पर ही डाल दी जाए। उन्हें देर रात बाहर न निकलने, अकेले यात्रा न करने, सुनसान जगहों पर न जाने या किसी पुरुष के साथ रहने की सलाह देकर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता।

सुरक्षित शहर का अर्थ यह नहीं कि महिलाएं कम बाहर निकलें; इसका अर्थ यह है कि वे बिना डर के कहीं भी जा सकें।

अगर कोई पार्क, सड़क, बस या सार्वजनिक परिवहन किसी महिला के लिए असुरक्षित है तो सवाल यह नहीं होना चाहिए कि वह वहां गई ही क्यों। सवाल यह होना चाहिए कि वह जगह असुरक्षित क्यों थी और उसे सुरक्षित बनाने की जिम्मेदारी किसकी थी।

बदलाव पुलिस से आगे समाज में भी चाहिए

यौन हिंसा को केवल अपराध और कानून के चश्मे से देखने से समस्या का पूरा समाधान नहीं होगा। बच्चों और युवाओं को कम उम्र से ही सहमति, सम्मान और लैंगिक समानता की समझ देना जरूरी है। परिवार, स्कूल, कॉलेज और कार्यस्थल—हर जगह ऐसा वातावरण बनाना होगा जहां महिलाओं के प्रति अपमानजनक व्यवहार को सामान्य न माना जाए।

पुरुषों और लड़कों को भी इस बदलाव का हिस्सा बनाना होगा। किसी महिला की सुरक्षा केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं है; यह पूरे समाज की जिम्मेदारी है।

आक्रोश से आगे बढ़ने का समय

हर बड़ी घटना के बाद समाज में आक्रोश पैदा होना जरूरी है, क्योंकि वह व्यवस्था को जगाता है। लेकिन आक्रोश अपने आप में बदलाव नहीं है। बदलाव तब आएगा, जब घटना के बाद की प्रतिक्रिया से आगे बढ़कर घटना से पहले की रोकथाम व्यवस्था का हिस्सा बनेगी।

सीसीटीवी हो, लेकिन उसकी निगरानी भी हो। पुलिस हो, लेकिन उसकी प्रतिक्रिया तेज हो। कानून हो, लेकिन उसका प्रभावी इस्तेमाल भी हो। अदालत हो, लेकिन न्याय समय पर मिले। और सबसे बढ़कर, समाज ऐसा हो जहां महिलाओं की स्वतंत्रता को खतरे का कारण नहीं, उनका अधिकार माना जाए।

मोमबत्तियां जलाना संवेदना का प्रतीक हो सकता है, लेकिन महिलाओं की सुरक्षा का स्थायी रास्ता जवाबदेह व्यवस्था, प्रभावी पुलिसिंग, त्वरित न्याय और बदली हुई सामाजिक सोच से होकर जाता है।

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