जवानों की हत्या से उठते सवाल
राजीव त्यागी
जम्मू-कश्मीर स्थित कठुआ में सीआईएसएफ के एक हेड कॉन्स्टेबल ने अपनी सर्विस ए.के-47 से गोलीबारी करके साथी जवानों को गोलियों से भून दिया। इससे पहले भी मानसिक द्वंद्व से गुजर रहे सुरक्षा बलों के जवानों के हिंसक प्रतिरोध के मामले सामने आए हैं। ये घटना बताती है कि सुरक्षा कर्मियों से जुड़ी समस्याओं के निपटारे के लिये मजबूत सिस्टम बनाने की सख्त जरूरत है। साथ ही यह घटना केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल में काम करने की स्थितियों पर भी प्रश्न उठाती है।
सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमारे जवान कितने तनाव से गुजर रहे हैं। दूर-दराज के इलाकों में तैनात जवानों को लंबी और अनियमित ड्यूटी, परिवार से जुड़ी मुश्किलों तथा घर से लंबे समय तक दूर रहने जैसी तमाम चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में किसी तनाव से गुजर रहे सुरक्षाकर्मी के व्यवहार व मानसिक स्थिति पर संवेदनशील ढंग से नजर रखने की जरूरत होती है। यह संकट इसलिए भी बड़ा है क्योंकि सुरक्षा कर्मियों का अनिवार्य रूप से हथियार रखना ड्यूटी का हिस्सा है।
जिसके चलते मामूली विवाद के घातक रूप लेने की आशंका लगातार बनी रहती है। इसका अभिप्राय यह कदापि नहीं है कि हर छोटा-मोटा विवाद हिंसक रूप में बदल ही सकता है। लेकिन ऐसे संकेतों पर समय रहते ध्यान देने की जरूरत होती है ताकि किसी दुखद घटना को टाला जा सके। निस्संदेह, केंद्रीय सशस्त्र सुरक्षा बलों में ऐसे दुखद हादसों को टालने हेतु, जवानों की शिकायतों के समाधान के लिये प्रभावी तंत्र और असरदार निगरानी की जरूरत है। वहीं दूसरी ओर सुरक्षा बलों में हथियारों को लेकर सुरक्षा उपाय और आसानी से उपलब्ध मनोवैज्ञानिक मदद, बचाव की रणनीति का हिस्सा हो सकती है। किसी भी सुरक्षाबल में जवानों का अनुशासित होना, अपरिहार्य शर्त है। वहीं सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में ऑपरेशन के लिये जवानों का हरदम शस्त्रों से लैस होना भी लाजिमी है। ऐसे में निगरानी व किसी भी टकराव को टालने के लिये उपायों को लेकर गंभीर पहल होनी चाहिए। कुछ वर्ष पूर्व गृह मंत्रालय की एक टास्क फोर्स ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल में कुछ जवानों द्वारा अपने साथियों की हत्या करने के मुख्य कारणों की पहचान की थी। जिसमें उल्लेख किया गया है कि कठोर सेवा शर्तें, छुट्टी मिलने में देरी-विशेषकर परिवार में आपात स्थिति के समय, आलोचना, उत्पीड़न पर प्रतिक्रिया तथा साथियों के अनुचित व्यवहार के कारण हिंसक प्रतिक्रियाएं बढ़ी हैं।
कठुआ की घटना की जांच में भी यह पता लगाया जाना चाहिए कि क्या इस मामले में निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया गया था। यह दुखद है कि कि देश के बुनियादी ढांचे की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले देश के एक प्रमुख सुरक्षा बल ने अपने चार जवानों को असमय खो दिया है। निस्संदेह, उनकी मौत के लिये जवाबदेही तय होनी चाहिए। लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में किसी सशस्त्र बल के भीतर का मनमुटाव कभी इतने घातक परिणामों तक न पहुंच पाये।




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