बिहार में बेलगाम होते अपराधियों के हौसले
- गंगा पाण्डेय
बिहार के जमुई जिले में हाल ही में सामने आई एक घटना ने राज्य की कानून-व्यवस्था और विशेष रूप से महिला सुरक्षा को लेकर सरकार के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कोचिंग पढ़ने जा रही एक नाबालिग छात्रा के साथ सड़क पर छेड़छाड़ और उसके साथी के साथ मारपीट की घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पूरे राज्य में आक्रोश देखा गया। यह घटना अकेली नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक प्रवृत्ति का एक प्रतिनिधि उदाहरण मात्र है जो पिछले कुछ समय से बिहार के विभिन्न हिस्सों से लगातार सामने आ रही है। सवाल यह उठता है कि जब राज्य सरकार बार-बार कानून-व्यवस्था को दुरुस्त रखने और अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का दावा करती है, तो सड़कों पर ऐसी घटनाएं क्यों घट रही हैं जिनमें अपराधी बेखौफ होकर सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करने का साहस जुटा लेते हैं।
यह विडंबना ही है कि जिस राजनीतिक दल और नेतृत्व ने वर्षों तक बिहार में तथाकथित "जंगल राज" को चुनावी मुद्दा बनाकर सत्ता हासिल की, आज उसी के शासनकाल में महिलाओं के खिलाफ अपराध की घटनाएं चिंताजनक रूप से बढ़ती दिख रही हैं। सत्ता में आने से पहले किए गए वादे - कि अपराधियों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा, कि महिलाओं को रात में भी सुरक्षित माहौल मिलेगा - अब खोखले साबित होते नजर आ रहे हैं। यह केवल एक राजनीतिक आलोचना का विषय नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे के टूटने की कहानी है जो आम जनता, विशेषकर महिलाओं ने सरकार पर जताया था। जब सत्ता में बैठे लोग बड़े-बड़े दावे करते हैं लेकिन जमीनी स्तर पर सुरक्षा का वातावरण नहीं बना पाते, तो जनता के भीतर एक गहरी निराशा और असुरक्षा की भावना घर करने लगती है।
इस समस्या के कई आयाम हैं जिन्हें समझना जरूरी है। पहला आयाम पुलिस प्रशासन की सक्रियता और उसकी प्रतिक्रिया की प्रकृति से जुड़ा है। अक्सर देखा गया है कि पुलिस तभी हरकत में आती है जब कोई घटना सोशल मीडिया के माध्यम से वायरल हो जाती है और जनदबाव बनता है। यह प्रतिक्रियात्मक रवैया इस बात का संकेत है कि निवारक पुलिसिंग यानी अपराध होने से पहले उसे रोकने की व्यवस्था कमजोर पड़ चुकी है। सड़कों पर गश्त, संवेदनशील इलाकों की पहचान, और समय रहते संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं यदि मजबूत हों, तो कई घटनाओं को घटित होने से पहले ही रोका जा सकता है। लेकिन जब पुलिस बल की तैनाती अपर्याप्त हो, संसाधनों की कमी हो और जवाबदेही तय करने का कोई ठोस तंत्र न हो, तो अपराधी बेखौफ होकर सार्वजनिक स्थानों पर भी अपराध करने से नहीं हिचकते।
दूसरा महत्वपूर्ण आयाम सामाजिक मानसिकता और अपराधियों के भीतर कानून के भय की कमी है। जब बार-बार यह देखा जाता है कि अपराध करने के बाद भी सजा मिलने की प्रक्रिया धीमी है, या राजनीतिक संरक्षण के चलते कई मामलों में कार्रवाई नहीं हो पाती, तो समाज में यह संदेश जाता है कि कानून का उल्लंघन करने पर गंभीर परिणाम नहीं भुगतने पड़ते। यह मानसिकता विशेष रूप से चिंताजनक तब हो जाती है जब यह देखने को मिलता है कि भीड़ में शामिल कुछ लोग सामूहिक रूप से किसी लड़की के साथ छेड़छाड़ या अपहरण जैसा गंभीर अपराध करने का साहस जुटा लेते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि समाज के एक हिस्से में कानून के प्रति डर लगभग समाप्त हो चुका है, और यही स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अत्यंत खतरनाक संकेत है।
तीसरा आयाम राजनीतिक जवाबदेही का है। जब मुख्यमंत्री स्वयं यह दावा करते हैं कि रात में भी अगर किसी महिला को कोई छूने की हिम्मत करे तो वे इस्तीफा दे देंगे, तो यह बयान जनता के मन में एक अपेक्षा पैदा करता है। लेकिन जब ऐसी घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं और सरकार की ओर से केवल घटना के बाद प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई होती है, इस्तीफे या नीतिगत बदलाव जैसा कुछ नहीं होता, तो जनता के भीतर यह भावना पनपती है कि ऐसे बयान केवल चुनावी नारे थे, वास्तविक प्रतिबद्धता नहीं। राजनीतिक जवाबदेही का यह अभाव लोकतंत्र में जनता और सरकार के बीच के रिश्ते को कमजोर करता है, क्योंकि जनता को यह अहसास होने लगता है कि चुनाव के बाद किए गए वादों की कोई वास्तविक कीमत नहीं रह जाती।
चौथा आयाम आंकड़ों और वास्तविकता के बीच के अंतर का है। सरकारी आंकड़े अक्सर अपराध दर में गिरावट या नियंत्रण का दावा करते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर आम नागरिकों, विशेषकर महिलाओं का अनुभव इसके विपरीत होता है। यह अंतर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नीति-निर्माण अक्सर आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर होता है, जबकि जमीनी असुरक्षा की भावना को मापना कठिन होता है। जब तक सरकार अपराध की रिपोर्टिंग को अधिक पारदर्शी और सुगम नहीं बनाती, और पीड़ितों को बिना किसी डर या दबाव के शिकायत दर्ज कराने का माहौल नहीं मिलता, तब तक वास्तविक स्थिति की सही तस्वीर सामने नहीं आ सकेगी।
इस समस्या का एक और महत्वपूर्ण पहलू शिक्षा और कोचिंग जाने वाले छात्र-छात्राओं की सुरक्षा से जुड़ा है। आज बड़ी संख्या में ग्रामीण और कस्बाई इलाकों से छात्र-छात्राएं पढ़ाई के लिए दूर-दराज कोचिंग संस्थानों तक आते-जाते हैं, अक्सर सुनसान सड़कों से होकर। इन रास्तों पर पर्याप्त रोशनी, सीसीटीवी निगरानी, और पुलिस गश्त जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव उन्हें असुरक्षित बना देता है। यदि सरकार वास्तव में शिक्षा को प्राथमिकता देती है और चाहती है कि बेटियां बिना डर के पढ़ाई कर सकें, तो उसे इन रास्तों की सुरक्षा को एक ठोस नीतिगत मुद्दे के रूप में लेना होगा, न कि केवल घटना के बाद बयानबाजी करनी होगी।
यह समझना जरूरी है कि महिला सुरक्षा केवल पुलिस बल की तैनाती या कानूनी प्रावधानों तक सीमित मुद्दा नहीं है। यह एक व्यापक सामाजिक-राजनीतिक प्रतिबद्धता की मांग करता है जिसमें प्रशासनिक सुधार, त्वरित न्याय प्रक्रिया, सामाजिक जागरूकता, और सबसे महत्वपूर्ण, राजनीतिक इच्छाशक्ति शामिल हो। केवल चुनावी भाषणों में सुरक्षा के वादे करना और सत्ता में आने के बाद उन्हें भुला देना, किसी भी समाज के लिए दीर्घकालिक नुकसानदेह साबित होता है। बिहार जैसे राज्य में, जहां पहले से ही कानून-व्यवस्था को लेकर एक विशेष राजनीतिक इतिहास और जनता की स्मृति जुड़ी हुई है, वहां सत्तारूढ़ दल के लिए यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वह अपने वादों को जमीन पर उतारते हुए दिखे। जब तक दावे और वास्तविकता के बीच की यह खाई नहीं पटेगी, तब तक आम जनता, और विशेष रूप से महिलाओं के बीच वास्तविक सुरक्षाबोध पैदा नहीं हो सकेगा। इसके लिए केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि निरंतर, पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासनिक तंत्र की आवश्यकता है, जो घटना घटित होने के बाद नहीं बल्कि उससे पहले ही सक्रिय हो।
(लेखिका बाढ़, पटना से हैं)




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