यदि दयालुता हमारा स्वभाव है, तो हिंसा कहाँ से आती है?
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर गुरुदेव श्री श्री रविशंकर का संदेश
हर व्यक्ति का स्वाभाविक स्वरूप दयालु, प्रेमपूर्ण, करुणामय और आनंदमय होता है। कोई भी बच्चा बिना कारण नहीं रोता। वह तब रोता है, जब उसे भूख लगी हो, नींद आ रही हो या वह भयभीत हो। इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति हिंसक व्यवहार करता है, तो उसके पीछे भी कोई न कोई कारण अवश्य होता है। यदि किसी व्यक्ति में करुणा का अभाव दिखाई देता है, तो उसकी जड़ में अक्सर अकेलापन, भय, अस्वीकृति की भावना और अपनेपन का अभाव छिपा होता है।
जब कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से बीमार होता है, तो हम उसे अस्पताल भेजते हैं। लेकिन जब उसके व्यवहार में विकृति आती है, तो उसे जेल भेज दिया जाता है। जेल भेजने के साथ-साथ हमें उसे ऐसे साधन और तकनीकें भी उपलब्ध करानी चाहिए, जिनसे वह अपनी भावनाओं को समझ सके, अपने व्यवहार में सुधार ला सके और स्वयं में सकारात्मक परिवर्तन कर सके।
मानसिक स्वास्थ्य आज पूरी दुनिया के सामने बड़ी चुनौती है। विकासशील और विकसित देश, युद्धग्रस्त क्षेत्र और शांतिपूर्ण समाज—कोई भी इससे अछूता नहीं है। बड़ी संख्या में युवा अवसाद, अकेलेपन, आक्रामकता और मानसिक तनाव का सामना कर रहे हैं। भारत अपनी आध्यात्मिक परंपरा और योग-ध्यान की विरासत के माध्यम से इस वैश्विक मानसिक स्वास्थ्य संकट से निपटने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
सामान्यतः न तो घर में और न ही विद्यालय में हमें अपनी भावनाओं को संभालना सिखाया जाता है। अकेलापन महसूस करना स्वाभाविक है। धन, परिवार और मित्र होने के बावजूद व्यक्ति भीतर से उदास या अकेला महसूस कर सकता है। आज अकेलापन मानसिक स्वास्थ्य के बड़े संकट के रूप में सामने आ रहा है, क्योंकि हमने स्वयं के साथ रहना और अपने भीतर शांत रहना सीखा ही नहीं है। यदि हम अपने भीतर शांति और आनंद खोजना सीख लें, तो वही आनंद हमारे आसपास के लोगों तक भी पहुंचने लगेगा।
हमारी श्वास स्वस्थ मन की कुंजी है। स्वस्थ मन की पहचान चेहरे पर ऐसी मुस्कान से होती है, जिसे कोई हमसे छीन न सके। इसके साथ ही भीतर ऐसा आत्मविश्वास होना चाहिए कि हम किसी भी चुनौती का सामना कर सकें। स्वस्थ मन आलोचना को स्वीकार करने के साथ-साथ स्वस्थ और रचनात्मक आलोचना करने का साहस भी रखता है। यह निर्भय होने के साथ विनम्र बने रहने की क्षमता है।
हर भावना का शरीर और श्वास पर प्रभाव पड़ता है। जब हम उदास होते हैं तो हमारी श्वास का ढंग अलग होता है और प्रसन्न होने पर अलग। क्रोध, निराशा या ईर्ष्या जैसी भावनाओं के समय अक्सर समझ नहीं आता कि उनके साथ कैसे व्यवहार किया जाए और हम उन्हें भीतर ही दबाए रखते हैं। ऐसे में अपनी श्वास पर ध्यान देना मन को शांत करने और भावनाओं को संतुलित करने का सरल माध्यम बन सकता है।
श्वास निरंतर हमारे भीतर आती-जाती रहती है। यदि हम कुछ समय उसके प्रति सजग हो जाएं, तो वह हमें मानसिक शांति, ऊर्जा और प्रसन्नता की ओर ले जा सकती है। दुनिया भर में करोड़ों लोगों ने सरल श्वास तकनीकों और ध्यान को अपनाया है। सुदर्शन क्रिया सहित विभिन्न साधन और अभ्यास अनेक लोगों को तनाव, चिंता और निराशा से उबरने में सहायता कर रहे हैं।
मानसिक स्वास्थ्य केवल बीमारी का अभाव नहीं, बल्कि भीतर शांति, आत्मविश्वास, करुणा और आनंद का अनुभव है। हमें अपने मन को समझना और अपनी भावनाओं के साथ स्वस्थ तरीके से रहना सीखना होगा। यही व्यक्तिगत शांति से सामाजिक शांति और हिंसा से करुणा की ओर बढ़ने का मार्ग है।


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