आर्थिकी से जुड़े शिक्षा
राजीव त्यागी
किसी देश की शिक्षा नीति और वहां के आर्थिक विकास के बीच का संबंध बहुत व्यापक विमर्श का प्रश्न रहा है। समय-समय पर कई एजेंसियों ने इस संबंध में शोध किए हैं। इस मामले में भले ही सीधे आंकड़ों के आधार पर कोई नतीजा देना संभव नहीं है, लेकिन इस बात पर तमाम जानकार एकमत रहे हैं कि किसी देश में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की व्यवस्था जितनी सुदृढ़ होती है, वहां की अर्थव्यवस्था को उतनी ही मजबूत बुनियाद मिलती है।
देश के दूर-दराज इलाकों में शिक्षा की लौ जलाना एक समय सबसे बड़ी चुनौती थी, लेकिन समय के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से विस्तार किया गया, नतीजतन आज देश पूर्ण साक्षरता की ओर बढ़ रहा है। लेकिन साक्षरता के बाद अगला सवाल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का आता है और उसके साथ यह प्रश्न भी जुड़ता है कि शिक्षा का मूल उद्देश्य क्या होना चाहिए? गांव-गांव तक विद्यालय और महाविद्यालय पहुंचने के बावजूद बड़ी संख्या में युवा रोजगार की तलाश में हैं।
इसलिए चुनौती केवल शिक्षा का विस्तार करने की नहीं, बल्कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करने की है जो ज्ञान, व्यक्तित्व, कौशल, नागरिक चेतना और रोजगार जैसे कारकों को साथ लेकर चले। प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय वृद्धि देखने को मिलती है, लेकिन इसके साथ शिक्षित बेरोजगारी की चुनौती भी लगातार गंभीर होती दिखाई दे रही है। विद्यालयों एवं महाविद्यालय में विद्यार्थियों को यह समझाने का माध्यम बने कि उनकी शिक्षा वास्तविक जीवन और रोजगार में कैसे उपयोगी हो सकती है।
कौशल विकास की सफलता केवल प्रमाणपत्रों से नहीं, बल्कि रोजगार, उद्यम और आय में वृद्धि से मापी जानी चाहिए। व्यावहारिक शिक्षा और स्थानीय अर्थव्यवस्था के बीच मजबूत संबंध बनना चाहिए। इसके साथ ही युवा शोधकर्ताओं को नवाचार और प्रयोग के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत है। इसके लिए एक मजबूत शोध पारिस्थितिकी तैयार की जाए और ऐसा वातावरण तैयार किया जाए जहां युवा शोधकर्ताओं को नए विचारों पर काम करने और प्रयोग करने का पूरा अवसर मिल सके।





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