किसान के बेटे मानस कुमार से बने ‘डॉक्टर मानस’, गांव के पहले पीएचडी धारक

छोटे से गांव से शुरू हुआ सफर बीएचयू तक पहुंचा, जनजातीय बालिकाओं की शिक्षा पर किया शोध

रांची। झारखंड की राजधानी रांची के छोटे से गांव हरही महतो टोली से निकलकर मानस कुमार ने शिक्षा के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। किसान पिता पंचू महतो और माता सुगिया देवी के बेटे मानस ने तमाम चुनौतियों के बीच पढ़ाई जारी रखी और अब पीएचडी की उपाधि हासिल कर ‘डॉक्टर मानस’ बन गए हैं। वह अपने गांव से डॉक्टर की उपाधि हासिल करने वाले पहले व्यक्ति हैं।

मानस ने कक्षा 10 तक की पढ़ाई नगड़ी स्थित डॉ. भीमराव आंबेडकर मेमोरियल स्कूल से की। इसके बाद मारवाड़ी कॉलेज, रांची से विज्ञान विषय में इंटरमीडिएट और रांची कॉलेज से भौतिकी में स्नातक की डिग्री हासिल की। शिक्षा के क्षेत्र में करियर बनाने के उद्देश्य से उन्होंने विनोबा भावे विश्वविद्यालय के अंतर्गत राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय से बीएड किया।

शिक्षक से शोधार्थी तक का सफर

सीटीईटी परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मानस ने करीब एक वर्ष तक सरस्वती विद्या मंदिर, बेड़ो में शिक्षक के रूप में सेवाएं दीं। हालांकि उच्च शिक्षा और शोध के प्रति उनकी रुचि उन्हें आगे बढ़ाती रही। उन्होंने गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय, छत्तीसगढ़ से शिक्षा विषय में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की।

इसके बाद उन्होंने प्रतिष्ठित यूजीसी नेट-जेआरएफ परीक्षा उत्तीर्ण की। इस सफलता के बाद उन्हें काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू), वाराणसी के शिक्षा संकाय में शोध का अवसर मिला। यहां शिक्षा संकाय की वरिष्ठ प्रोफेसर मधु कुशवाहा के निर्देशन में उन्होंने शोध कार्य पूरा किया।

जनजातीय बेटियों की शिक्षा पर शोध

डॉ. मानस के शोध का विषय ‘झारखंड में जनजातीय लड़कियों की शिक्षा : कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय का एक मूल्यांकन अध्ययन’ रहा। शोध में लोहरदगा और गुमला जिलों के कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों को शामिल किया गया। इस अध्ययन के माध्यम से उन्होंने जनजातीय बालिकाओं की शिक्षा, उनकी शैक्षणिक स्थिति और कस्तूरबा विद्यालयों की भूमिका का मूल्यांकन किया।

गांव की साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर बीएचयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से पीएचडी हासिल करना उनके लिए ही नहीं, बल्कि उनके परिवार और गांव के लिए भी गौरव का विषय है।

परिवार और गुरुजनों को दिया श्रेय

डॉ. मानस अपनी इस उपलब्धि का श्रेय अपनी शोध पर्यवेक्षिका प्रोफेसर मधु कुशवाहा, माता-पिता, जीवनसाथी स्नेहा सम्पन्न, भाई-बहनों और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ उन सभी लोगों को देते हैं, जिन्होंने उनकी शैक्षणिक यात्रा में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग किया। उनका सफर ग्रामीण पृष्ठभूमि के उन विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में आगे बढ़ने का सपना देखते हैं।

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