अमेरिका से निवेश घटा रहे बड़े निवेशक, सोने और चीन की ओर बढ़ा रुझान

40 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा के अमेरिकी कर्ज और बढ़ती बॉन्ड यील्ड से चिंता; डॉलर अब भी सबसे बड़ी रिजर्व करेंसी

वॉशिंगटन। अमेरिका के बढ़ते कर्ज, ऊंची ब्याज दरों, टैरिफ और आर्थिक नीतियों को लेकर कुछ बड़े वैश्विक निवेशकों में अमेरिकी परिसंपत्तियों पर निर्भरता कम करने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। कुछ सरकारी फंड अमेरिकी बॉन्ड में निवेश घटाने पर विचार कर रहे हैं, जबकि केंद्रीय बैंक सोने का भंडार बढ़ा रहे हैं। इसी बीच जर्मन कंपनियों ने 2026 की पहली छमाही में अमेरिका में निवेश घटाकर चीन में निवेश बढ़ाया है। हालांकि, डॉलर और अमेरिकी वित्तीय बाजारों की वैश्विक भूमिका अब भी मजबूत बनी हुई है।

अमेरिकी बॉन्ड की यील्ड बढ़ी

अमेरिकी 10 साल के ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड सितंबर में करीब पांच प्रतिशत तक पहुंच गई। 11 सितंबर को यह 4.93 प्रतिशत थी। यील्ड बढ़ने का मतलब है कि अमेरिकी सरकार को बाजार से कर्ज लेने के लिए अपेक्षाकृत अधिक ब्याज देना पड़ रहा है। इससे सरकार की ब्याज लागत और वित्तीय दबाव बढ़ने की चिंता जताई जा रही है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने हालांकि वित्तीय व्यवस्था और हाल की बॉन्ड नीलामियों को मजबूत बताया है।

नॉर्वे के फंड में अमेरिकी बॉन्ड घटाने की योजना

करीब 2.3 ट्रिलियन डॉलर के नॉर्वेजियन सरकारी फंड में सरकारी बॉन्ड की हिस्सेदारी 70 से घटाकर 50 प्रतिशत करने का प्रस्ताव है। इसमें अमेरिकी बॉन्ड में करीब 80 अरब डॉलर तक की कमी की संभावना बताई गई है। फंड जापान समेत अन्य देशों के बॉन्ड में निवेश बढ़ाने पर भी विचार कर रहा है। इसका उद्देश्य निवेश को अलग-अलग परिसंपत्तियों और बाजारों में बांटना है।

जर्मनी का अमेरिका में निवेश 65% घटा

2026 की पहली छमाही में जर्मन कंपनियों का अमेरिका में निवेश 65 प्रतिशत घटकर 4.3 अरब यूरो रह गया। इसके विपरीत चीन में उनका निवेश करीब एक-तिहाई बढ़कर 5.6 अरब यूरो पहुंच गया। जर्मन इकोनॉमिक इंस्टीट्यूट के अनुसार, अमेरिका की टैरिफ और व्यापार नीतियों को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच यह बदलाव सामने आया है।

डॉलर की हिस्सेदारी में मामूली गिरावट

आईएमएफ के अनुसार, 2025 की अंतिम तिमाही में वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी 56.77 प्रतिशत रही, जो पिछली तिमाही के 56.93 प्रतिशत से थोड़ी कम है। चीन की रेनमिन्बी की हिस्सेदारी 1.95 प्रतिशत थी। विशेषज्ञों के अनुसार, डॉलर की हिस्सेदारी में कमी का मतलब यह नहीं है कि उसकी जगह कोई दूसरी मुद्रा ले रही है। अमेरिकी डॉलर अब भी दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसी बना हुआ है।

केंद्रीय बैंक सोना खरीद रहे

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, केंद्रीय बैंकों ने 2025 में 863 टन सोना खरीदा। यह 2024 से कम था, लेकिन दीर्घकालिक औसत से काफी अधिक रहा। 2022 से 2025 के बीच केंद्रीय बैंकों की सालाना सोना खरीद औसतन करीब 1,000 टन रही। 2026 में पोलैंड, उज्बेकिस्तान, चीन और कजाकिस्तान समेत कई देशों ने भी अपने स्वर्ण भंडार में बढ़ोतरी की है।

अमेरिका से पूरी तरह दूरी नहीं

इन बदलावों के बावजूद वैश्विक निवेशकों का अमेरिका से पूरी तरह हटना नहीं दिखता। डॉलर की वैश्विक रिजर्व मुद्रा के रूप में मजबूत स्थिति बनी हुई है और अमेरिकी शेयर बाजार तथा सरकारी बॉन्ड में दुनिया भर का बड़ा निवेश जारी है। मौजूदा बदलाव को अधिकतर निवेश के विविधीकरण और जोखिम को अलग-अलग बाजारों में बांटने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

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