कॉर्पोरेट जगत में बढ़ती नारी शक्ति

बोर्डरूम में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी बदल रही है कार्यस्थल की तस्वीर

इलमा अज़ीम 

बदलते समय के साथ महिलाओं की भूमिका में भी व्यापक परिवर्तन आया है। कभी घर की चारदीवारी तक सीमित मानी जाने वाली महिलाएं आज जीवन के लगभग हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा और नेतृत्व क्षमता का परिचय दे रही हैं। कॉरपोरेट जगत भी इससे अछूता नहीं है। कंपनियों के शीर्ष नेतृत्व और निदेशक मंडलों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी इस बदलाव का महत्वपूर्ण संकेत है।

कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार हाल के वर्षों में कंपनियों के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। निजी और सरकारी कंपनियों को मिलाकर यह हिस्सेदारी करीब 29 प्रतिशत तक पहुंच गई है। एकल स्वामित्व वाली कंपनियों में भी महिलाओं की भागीदारी लगभग 28 प्रतिशत बताई गई है। यह आंकड़े बताते हैं कि कॉरपोरेट क्षेत्र में महिलाओं के लिए अवसरों का दायरा लगातार बढ़ रहा है।

इस बदलाव में कानूनी प्रावधानों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत प्रत्येक सूचीबद्ध कंपनी और निर्धारित मानदंड पूरा करने वाली सार्वजनिक कंपनियों के निदेशक मंडल में कम से कम एक महिला निदेशक का होना अनिवार्य किया गया है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के नियमों ने भी इस दिशा में कंपनियों को जवाबदेह बनाया है।

हालांकि, केवल कानूनी अनिवार्यता ही इस बदलाव का कारण नहीं है। कॉरपोरेट जगत में महिलाओं की नेतृत्व क्षमता को लेकर सोच भी बदली है। कंपनियां अब बोर्डरूम में विविधता को सामाजिक सरोकार के साथ-साथ व्यावसायिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मान रही हैं। अलग-अलग अनुभव और दृष्टिकोण निर्णय प्रक्रिया को व्यापक बनाने में मदद करते हैं।

बोर्डरूम में महिलाओं की भागीदारी के कई संभावित लाभ सामने आए हैं। विभिन्न अध्ययनों में महिला निदेशकों की बेहतर निगरानी, जोखिम प्रबंधन, नैतिक संवेदनशीलता और निर्णय प्रक्रिया में विविध दृष्टिकोण के योगदान को रेखांकित किया गया है। महिला नेतृत्व से संस्थानों में अधिक समावेशी कार्य वातावरण बनाने में भी मदद मिल सकती है। इससे महिला कर्मचारियों के मनोबल और संस्थान से उनके दीर्घकालिक जुड़ाव पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना रहती है।

फिर भी मंजिल अभी दूर है। शीर्ष स्तर पर महिलाओं की मौजूदगी को केवल कानूनी रूप से अनिवार्य एक सदस्य तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। वास्तविक लैंगिक समानता तभी दिखाई देगी, जब महिलाएं बोर्डरूम में संख्या के साथ-साथ महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली भूमिकाओं में भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व हासिल करें।

इसके लिए कंपनियों को नियुक्ति और पदोन्नति में समान अवसर, नेतृत्व विकास, मार्गदर्शन और सुरक्षित एवं समावेशी कार्य वातावरण सुनिश्चित करना होगा। सामाजिक पूर्वाग्रहों और लैंगिक रूढ़ियों को पीछे छोड़कर महिलाओं की क्षमता पर भरोसा करना भी जरूरी है। कॉरपोरेट जगत में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी निश्चित रूप से परिवर्तन का संकेत है, लेकिन इस परिवर्तन को स्थायी और व्यापक बनाने के लिए अवसरों के साथ-साथ नेतृत्व की वास्तविक जिम्मेदारियां भी महिलाओं को सौंपनी होंगी।

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