रूढ़ियां और कुरीतियां
इलमा अज़ीम
वास्तविक आधुनिकता तभी संभव है, जब समाज महिलाओं को वस्तु या लेन-देन का माध्यम नहीं, बल्कि समान अधिकारों वाली स्वतंत्र नागरिक और नेतृत्वकारी शक्ति के रूप में स्वीकार करे। सवाल यही है कि भौतिकवाद की चकाचौंध के बीच ये घृणित रूढ़ियां आखिर कब टूटेंगी?
मध्यकाल से लेकर आज तक चली आ रही अनेक जर्जर रूढ़ियां और परंपराएं हमें शर्मिंदा भी करती हैं। दास प्रथा भले ही समाप्त हो चुकी हो, पर छुआछूत, दहेज, बाल विवाह, शादी-ब्याह में फिजूलखर्ची और सामाजिक आडंबर जैसी कुरीतियां किसी न किसी रूप में आज भी मौजूद हैं।वर्षों से सामाजिक और कानूनी अभियानों के बावजूद देश में बाल विवाह के मामले सामने आ रहे हैं।
यह माना जाता है कि आज लड़कियों को शिक्षा, प्रतियोगिताओं और रोजगार के अवसर मिल रहे हैं तथा वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। फिर भी कुछ राज्यों में बाल विवाह जारी हैं। कहीं न कहीं सामाजिक दबाव इसके लिए जिम्मेदार है। गौरतलब है कि देश में तेज आर्थिक विकास, मोबाइल और डिजिटल पहुंच तथा शिक्षा के विस्तार के दावे किए जाते हैं, वहां दहेज प्रथा का निर्बाध बने रहना भी गंभीर विरोधाभास है। अतः यह मान लेना आत्मप्रवंचना होगी कि भारत ने पुरानी सामाजिक कुरीतियों से पूरी तरह मुक्ति पा ली है।
आधुनिकता केवल तकनीक, धन, उपभोग और ऊंची इमारतों से नहीं आती। वास्तविक आधुनिकता तभी संभव है, जब समाज महिलाओं को वस्तु या लेन-देन का माध्यम नहीं, बल्कि समान अधिकारों वाली स्वतंत्र नागरिक और नेतृत्वकारी शक्ति के रूप में स्वीकार करे।




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